गुरुग्राम जमीन घोटाला : राउज एवेन्यू अदालत ने रॉबर्ट वाड्रा और आठ अन्य को समन जारी किया

नयी दिल्ली, 15 अप्रैल (वार्ता) हरियाणा में गुरुग्राम के शिकोहपुर भूमि घोटाले मामले में यहां की राउज एवेन्यू कोर्ट ने श्री रॉबर्ट वाड्रा और आठ अन्य व्यक्तियों को समन जारी किया है।

विशेष न्यायाधीश सुशांत चांगोत्रा ने इस हाई-प्रोफाइल धन शोधन मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से दायर आरोप पत्र पर संज्ञान लेते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा सहित सभी आरोपियों को 16 मई को पेश होने का निर्देश दिया है।

यह मामला 2008 के एक भूमि सौदे से संबंधित है, जिसमें श्री रॉबर्ट वाड्रा के स्वामित्व वाली कंपनी ‘स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी’ ने ओमकारेश्वर प्रॉपर्टीज से शिकोहपुर गांव में 3.5 एकड़ जमीन 7.5 करोड़ रुपये में खरीदी थी।

यह लेनदेन हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान हुआ था। ईडी की जांच इन आरोपों पर केंद्रित है कि हुड्डा प्रशासन ने श्री वाड्रा की कंपनी को कमर्शियल लाइसेंस प्रदान कर भारी वित्तीय लाभ पहुंचाया, जिससे जमीन की कीमत कई गुना बढ़ गयी।

जांच से पता चलता है कि शुरुआती खरीद के तुरंत बाद राज्य सरकार ने उस भूखंड पर कमर्शियल कॉलोनी विकसित करने के लिए लाइसेंस जारी कर दिया था। खबरों के मुताबिक, कुछ ही महीनों के भीतर ‘स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी’ ने वही जमीन रियल एस्टेट दिग्गज डीएलएफ को 58 करोड़ रुपये में बेच दी। इस तरह महज छह महीने से भी कम समय में मूल कीमत से 700 प्रतिशत से भी अधिक के उछाल के साथ 50 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया गया।

ईडी ने ‘ओमकारेश्वर प्रॉपर्टीज’ की वैधता पर संदेह जताया है और आरोप लगाया है कि इसने एक ‘फ्रंट’ (मुखौटा कंपनी) के रूप में काम किया होगा। साथ ही, यह भी नोट किया गया है कि जमीन की खरीद के लिए दिया गया, मूल चेक कथित तौर पर कभी भुनाया ही नहीं गया था।

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा भी इस मामले में आरोपी हैं। जांचकर्ताओं का आरोप है कि उन्होंने श्री वाड्रा की फर्म को फायदा पहुंचाने के लिए अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग किया।

जांच में इन सौदों का संबंध वजीराबाद में डीएलएफ को 350 एकड़ जमीन के आवंटन से भी जोड़ा गया है, जिससे कथित तौर पर डेवलपर को 5,000 करोड़ रुपये का भारी मुनाफा हुआ था। यह विवाद पहली बार 2012 में तब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था, जब वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने लाइसेंस प्रक्रिया में भारी अनियमितताओं का हवाला देते हुए जमीन का दाखिल-खारिज रद्द कर दिया था।

यह कानूनी कार्रवाई 2018 में हरियाणा पुलिस की दर्ज की गयी प्राथमिकी के बाद शुरू हुई है, जिसमें धोखाधड़ी, आपराधिक साजिश और भ्रष्टाचार के आरोप शामिल थे। पुलिस जांच को आधार मानकर, ईडी ने अपराध की कमाई का पता लगाने के लिए धन शोधन का मामला दर्ज किया था।

 

 

 

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