अनुसंधान एवं विकास कार्य में निजी भागीदारी, परिणामो सुधार जरूरी: डॉ जितेन्द्र सिंह

नयी दिल्ली, 09 अप्रैल (वार्ता) केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने निजी क्षेत्र से अनुसंधान एवं विकास (आर एंड डी) गतिविधियों में अपनी भागीदारी बढ़ाने का आह्वान करते हुए गुरुवार को कहा कि देश में नवाचार के वातावरण को मजबूत करने के लिए उद्योग की सहभागिता आवश्यक है।

डॉ सिंह ने गुरुवार को यहां नीति आयोग की अनुसंधान एवं विकास प्रक्रियाओं को सुगम बनाने संबंधी दो रिपोर्टों के विमोचन समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि सरकार ने इसी उद्देश्य से अब अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों को भी निजी कंपनियों के लिए खोला है। अनुसंधान एवं विकास में मदद के लिए विशेष कोष बनाए हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि प्रणालियों के निर्माण के तरीके से हटकर अब ध्यान इस बात पर केंद्रित होना चाहिए कि जमीनी स्तर पर शोधकर्ताओं का व्यवस्था को लेकर वास्तविक अनुभव कैसा होता है। उन्होंने कहा कि इन वास्तविक चुनौतियों का साक्ष्य-आधारित दस्तावेजीकरण महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सुधार का पक्ष मजबूत होता है।

नीति आयोग द्वारा जारी रिपोर्टें विभिन्न संस्थानों के शोधकर्ताओं के साथ परामर्श पर आधारित हैं और अनुसंधान प्रणालियों में अधिक लचीलेपन, पारदर्शिता और पूर्वानुमान की आवश्यकता पर प्रकाश डालती हैं। इनमें इस बात पर बल दिया गया है कि दक्षता का अर्थ केवल समय सीमा कम करना ही नहीं है, बल्कि स्पष्टता प्रदान करना भी है, जिससे वैज्ञानिक निरंतरता और विश्वास के साथ अपने कार्य की योजना बना सकें।

डॉ. सिंह ने कहा, ” इसमें कोई संदेह नहीं है कि अनुसंधान तभी फल-फूल सकता है जब कोई बाधा न हो, कोई गतिरोध न हो और कोई अनावश्यक रुकावट न हो।” उन्होंने आगे कहा कि बाहरी व्यवधान अपरिहार्य होने पर भी, विलंब को बढ़ने से रोकने के लिए “विचारणीय मुद्दों का समाधान किया जाना चाहिए”।

उन्होंने कहा कि यद्यपि देश में “मानव संसाधनों की कोई कमी नहीं है” और इसकी वैज्ञानिक प्रतिभा को वैश्विक स्तर पर तेजी से मान्यता मिल रही है, फिर भी संस्थागत और प्रक्रियात्मक बाधाएं परिणामों को बाधित करती रहती हैं।”

उन्होंने अनुसंधान वित्तपोषण और कार्यान्वयन में निजी उद्योग की सीमित भागीदारी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि केवल सरकारी समर्थन से दीर्घकालिक नवाचार को बनाए रखना संभव नहीं है। उन्होंने अनुसंधान के लिए कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) खर्च में मौजूद कमियों की ओर भी ध्यान दिलाया, खासकर जब मौजूदा आवंटन भी अनुसंधान एवं विकास उद्देश्यों के लिए पूरी तरह से उपयोग नहीं किए जा रहे हैं।

नीति आयोग के उपाध्यक्ष सुमन बेरी ने कहा कि अनुसंधान एवं विकास प्रक्रियाओं को सुगम बनाने की यह पहल वैज्ञानिक समुदाय की प्रशासनिक बोझ को कम करने और प्रणाली की दक्षता में सुधार लाने की लंबे समय से चली आ रही मांगों पर आधारित है।

नीति आयोग के सदस्य वी.के. सारस्वत ने कहा कि भारत का अनुसंधान तंत्र एक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, जहां धनराशि मिलने में देरी और प्रशासनिक अड़चनों जैसी प्रणालीगत कमियां अनुसंधान की गति और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित कर रही हैं। उन्होंने संस्थागत स्वायत्तता बढ़ाने, शोधकर्ताओं पर अनुपालन का बोझ कम करने और अनुसंधान, नवाचार तथा उद्योग के बीच मजबूत संबंध स्थापित करने के साथ-साथ निधि एवं नीतिगत ढांचों में समन्वित और शीर्ष स्तर से सुधारों का आह्वान किया।

प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. ए.के. सूद ने कम वित्तपोषण सफलता दर, ट्रेजरी सिंगल अकाउंट (टीएसए) ढांचे जैसे अनसुलझे मुद्दों और भर्ती एवं बुनियादी ढांचे में बाधाओं को उजागर करते हुए, सिफारिशों को अमल में लाने के लिए मजबूत समन्वय और निरंतर क्रियान्वयन का आग्रह किया।

 

 

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