वेनेजुएला में बुधवार को आए विनाशकारी भूकंप ने एक बार फिर पूरी दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आधुनिक विकास की अंधी दौड़ हमें किस दिशा में ले जा रही है. रिक्टर स्केल पर 7.2 और 7.5 तीव्रता के दो शक्तिशाली झटकों ने कुछ ही क्षणों में हजारों लोगों का जीवन बदल दिया. अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) द्वारा व्यक्त की गई आशंका कि मृतकों की संख्या दस हजार से लेकर एक लाख तक पहुंच सकती है, इस त्रासदी की भयावहता को दर्शाती है.
भूकंप मूल रूप से एक प्राकृतिक घटना है, जिसका सीधा संबंध पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेटों की गतिविधियों से होता है. यह कहना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा कि किसी एक भूकंप के लिए सीधे मानव गतिविधियां जिम्मेदार हैं. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि मानव द्वारा प्रकृति के साथ किए जा रहे लगातार हस्तक्षेप ने प्राकृतिक आपदाओं की विनाशक क्षमता को कई गुना बढ़ा दिया है.
आज पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित संसाधन दोहन के दुष्परिणाम भुगत रही है. जंगलों की अंधाधुंध कटाई, पर्वतों का अत्यधिक खनन, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में हस्तक्षेप और शहरीकरण की बेतहाशा रफ्तार ने धरती के प्राकृतिक संतुलन को कमजोर किया है. वैज्ञानिक वर्षों से चेतावनी देते रहे हैं कि पृथ्वी के पर्यावरणीय तंत्र पर बढ़ता दबाव भविष्य में अधिक गंभीर और जटिल आपदाओं को जन्म दे सकता है.
वेनेजुएला की त्रासदी इसी व्यापक संदर्भ में देखी जानी चाहिए. भूकंप के बाद 20 से अधिक आफ्टर शॉक्स का आना, बड़े पैमाने पर भवनों का ढहना और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे का नष्ट होना केवल भूगर्भीय घटना की कहानी नहीं है. यह उन विकास मॉडलों पर भी सवाल है जो प्राकृतिक जोखिमों को नजरअंदाज कर केवल आर्थिक लाभ को प्राथमिकता देते हैं. यदि शहरों की योजना भूकंप-रोधी मानकों के अनुरूप न हो, यदि पर्यावरणीय प्रभावों का गंभीर अध्ययन न किया जाए और यदि प्राकृतिक चेतावनियों की अनदेखी की जाए, तो आपदाएं और अधिक घातक बन जाती हैं.
ग्लोबल वार्मिंग का एक और प्रभाव यह है कि दुनिया भर में चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है. कहीं भीषण गर्मी है, कहीं विनाशकारी बाढ़ है, कहीं सूखा है और कहीं भूस्खलन. पृथ्वी का पर्यावरणीय संतुलन जितना कमजोर होगा, समाजों की आपदाओं से निपटने की क्षमता भी उतनी ही कम होगी. इसलिए प्राकृतिक आपदाओं को केवल भाग्य या नियति का प्रश्न मानकर नहीं छोड़ा जा सकता.
वेनेजुएला की यह त्रासदी पूरी मानवता के लिए चेतावनी है. विकास आवश्यक है, लेकिन वह प्रकृति के साथ संघर्ष करके नहीं, बल्कि उसके साथ संतुलन बनाकर होना चाहिए. दुनिया को अब पर्यावरण संरक्षण, टिकाऊ विकास, जिम्मेदार खनन और आपदा-प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता देनी होगी. अन्यथा प्रकृति बार-बार यह याद दिलाती रहेगी कि उसके नियमों की अनदेखी की कीमत अंतत: मानव सभ्यता को ही चुकानी पड़ती है.
वेनेजुएला के मलबे से उठती चीखें केवल एक देश का दर्द नहीं हैं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर संदेश हैं कि प्रकृति को जीतने की नहीं, उसके साथ सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता है. तभी भविष्य सुरक्षित और स्थायी बन सकेगा.
