
छतरपुर। ऑस्ट्रेलिया की 8 दिवसीय आध्यात्मिक यात्रा पर पहुँचे बागेश्वर धाम पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने आज बुधवार को एक नया इतिहास रच दिया। यह पहला अवसर है जब किसी भारतीय संत ने ऑस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा स्थित संसद भवन में सनातन संस्कृति और विश्व शांति का संदेश दिया। इस ऐतिहासिक सत्र की शुरुआत राष्ट्रगान और हनुमान चालीसा के पाठ के साथ हुई, जिसने वैश्विक पटल पर भारतीय अध्यात्म की स्वीकार्यता को एक नई ऊँचाई दी है।
संवाद ही एकमात्र विकल्प: युद्ध पर प्रहार
संसद में उपस्थित सांसदों और गणमान्य नागरिकों को संबोधित करते हुए बागेश्वर सरकार ने वैश्विक संघर्षों पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने ईरान-अमेरिका तनाव और मिडिल ईस्ट के हालातों का जिक्र करते हुए कहा, “विवाद कोई रास्ता नहीं, संवाद ही एकमात्र रास्ता है। यदि आपको विनाश करना है तो युद्ध को चुनो, लेकिन यदि विकास करना है तो बुद्ध का मार्ग चुनो।” उन्होंने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा कि युद्ध के बाद जमीन वहीं रह जाती है, लेकिन लड़ने वाले समाप्त हो जाते हैं।
अतृप्ति ही अशांति की जड़
शांति की गहन व्याख्या करते हुए महाराजश्री ने कहा कि अशांत मन से कभी भी शांत समाज का निर्माण नहीं हो सकता। उन्होंने कहा, “मनुष्य तब तक अशांत रहता है जब तक वह अतृप्त है। बड़े-बड़े राजा और वैभवशाली लोग अशांत हैं, जबकि साधु-संत अपनी तृप्ति के कारण परम शांत हैं। अपने भीतर के तत्व को पहचानना ही वास्तविक शांति है।”
भारत ने दुनिया को परिवार माना, व्यापार नहीं
भारतीय संस्कृति की महानता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया के अन्य देशों ने हमेशा व्यापारिक हितों को प्राथमिकता दी, लेकिन भारत ने सदैव ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के सिद्धांत पर चलते हुए पूरी दुनिया को एक परिवार की दृष्टि से देखा है। उन्होंने यह भी कहा कि जहाँ दुनिया ने स्त्रियों को भोग की वस्तु माना, वहीं भारतीय परंपरा ने उन्हें ‘पूज्या’ का स्थान देकर सम्मानित किया।
विश्व शांति के लिए 150 करोड़ सनातनियों का आभार
पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने ऑस्ट्रेलिया प्रशासन और वहां के मूल निवासियों का धन्यवाद करते हुए कहा कि विश्व शांति की चर्चा के लिए भारतीय संत को यह मंच प्रदान करना गौरव की बात है। उन्होंने कहा कि यह सम्मान विश्व के 150 करोड़ सनातनियों का सम्मान है। इस दौरान पूरा सदन भारतीय संस्कृति और अध्यात्म के रंग में रंगा नजर आया।
