वॉशिंगटन | अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने व्यापारिक एजेंडे को धार देते हुए विदेशी दवाओं और धातुओं (मेटल्स) पर नए और कड़े टैरिफ लागू करने का आदेश जारी किया है। इस नए आदेश के तहत, अमेरिका के बाहर बनी पेटेंट दवाओं पर अब 100 प्रतिशत टैरिफ लगाया जाएगा। ट्रंप प्रशासन का यह कदम ‘लिबरेशन डे’ की पहली वर्षगांठ पर उठाया गया है, जिसका मुख्य उद्देश्य विदेशी कंपनियों को अमेरिका में अपनी फैक्ट्रियां स्थापित करने के लिए मजबूर करना है। राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया है कि जो कंपनियां अमेरिका में उत्पादन वापस लाने (रीशोरिंग) का वादा करेंगी, उनके लिए यह टैरिफ घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया जाएगा, जबकि बड़ी कंपनियों को इस बदलाव के लिए 120 दिन का समय दिया गया है।
डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले से भारत की फार्मा इंडस्ट्री को बड़ा झटका लगने की आशंका है। ‘दुनिया का फार्मा हब’ कहे जाने वाले भारत से अमेरिका को बड़े पैमाने पर दवाओं का निर्यात किया जाता है। 100 प्रतिशत टैरिफ लागू होने के बाद अमेरिका में भारतीय दवाओं की कीमतें आसमान छूने लगेंगी, जिससे भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो जाएगी। हालांकि, यूरोपीय संघ, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को उनके मौजूदा व्यापार समझौतों के कारण इस भारी टैरिफ से फिलहाल बाहर रखा गया है। भारत के लिए अब चुनौती यह है कि वह अमेरिका के साथ “मोस्ट फेवर्ड नेशन” का समझौता करे या अपनी कंपनियों को वहां निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करे।
दवाओं के अलावा, ट्रंप ने स्टील, एल्युमीनियम और कॉपर से बने तैयार उत्पादों पर भी 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने का ऐलान किया है। इससे पहले अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने वैश्विक टैरिफ पर रोक लगा दी थी, लेकिन ट्रंप ने अलग-अलग कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल कर दोबारा शुल्क लागू करने की कोशिश की है। इस फैसले से न केवल फार्मा क्षेत्र, बल्कि ऑटोमोबाइल और कंस्ट्रक्शन जैसे उद्योगों में भी कच्चे माल की कीमतें बढ़ने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की यह “अमेरिका फर्स्ट” नीति वैश्विक सप्लाई चेन को पूरी तरह से बदल सकती है, जिससे आने वाले समय में उपभोक्ताओं के लिए इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों और स्वास्थ्य सेवाओं के महंगे होने का खतरा बढ़ गया है।

