नालंदा विश्वविद्यालय में ‘सेंटर फॉर साउथईस्ट एशियन स्टडीज’ का भव्य शुभारंभ, भारत और आसियान देशों के बीच ज्ञान और सभ्यता के रिश्तों को मिलेगी नई मजबूती

नई दिल्ली |  भारत ने दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों (ASEAN) के साथ अपने कूटनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों को एक नई ऊंचाई देते हुए प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय में ‘सेंटर फॉर साउथईस्ट एशियन स्टडीज’ की शुरुआत की है। विदेश मंत्रालय के सचिव (पूर्व) पी. कुमारन ने इस महत्वपूर्ण केंद्र का उद्घाटन किया, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 22वें आसियान-भारत शिखर सम्मेलन में की गई घोषणा का परिणाम है। यह केंद्र केवल एक अकादमिक इकाई नहीं, बल्कि भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ को मजबूती प्रदान करने वाला एक रणनीतिक सेतु बनेगा। बिहार की राजगीर पहाड़ियों में स्थित यह आधुनिक विश्वविद्यालय अब दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ व्यापार, विरासत, सार्वजनिक स्वास्थ्य और डिजिटल सहयोग जैसे 10 प्रमुख क्षेत्रों में गहन शोध और नीतिगत संवाद का मुख्य केंद्र होगा।

ऐतिहासिक रूप से नालंदा दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय था, जिसने सदियों पहले चीन, जापान, कोरिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के विद्वानों को आकर्षित किया था। 12वीं सदी में विनाश झेलने के बाद, पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के विजन और नीतीश कुमार सरकार के सहयोग से इसे पुनर्जीवित किया गया है। वर्तमान में इस नए केंद्र का उद्देश्य बौद्ध धर्म और साझा सभ्यता की विरासत को एक जीवंत पुल के रूप में उपयोग करना है। जेएनयू के प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली के अनुसार, यह संस्थान म्यांमार, थाईलैंड और कंबोडिया जैसे देशों के साथ पेशेवर शोध और शिक्षण को बढ़ावा देगा, जिससे भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ और सांस्कृतिक कूटनीति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान मिलेगी।

वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में दक्षिण-पूर्व एशिया इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के केंद्र में स्थित है। यह नया केंद्र दक्षिण चीन सागर विवाद, समुद्री कानून, आपूर्ति श्रृंखला और आपदा प्रबंधन जैसे संवेदनशील विषयों पर तटस्थ मंच प्रदान करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि नालंदा विश्वविद्यालय का यह प्रयास आधिकारिक कूटनीति से इतर ‘पीपल-टू-पीपल’ कनेक्ट यानी जन-संवाद को गहरा करेगा। एशियान-भारत व्यापक रणनीतिक साझेदारी (2026–2030) के लिए यह केंद्र एक ‘नॉलेज पार्टनर’ के रूप में कार्य करेगा। भारत सरकार का यह कदम स्पष्ट संकेत देता है कि वह दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ केवल आर्थिक या सुरक्षा स्तर पर ही नहीं, बल्कि बौद्धिक और ऐतिहासिक धरातल पर भी अपने रिश्तों को नई दिशा देने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

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