मुंबई | भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए अधिग्रहण वित्तपोषण (Acquisition Financing) और पूंजी बाजार जोखिम से जुड़े नए नियमों के कार्यान्वयन की समय सीमा बढ़ा दी है। अब ये संशोधित नियम 1 अप्रैल, 2026 के बजाय 1 जुलाई, 2026 से प्रभावी होंगे। केंद्रीय बैंक ने यह कदम विभिन्न बैंकों और उद्योग संघों से मिले फीडबैक के बाद उठाया है, ताकि ऋणदाताओं को नई परिचालन व्यवस्था और जोखिम प्रबंधन ढांचे को सुचारू रूप से लागू करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके। इस विस्तार से उन कंपनियों को राहत मिलेगी जो वर्तमान में बड़े विलय या अधिग्रहण की प्रक्रिया में हैं।
नए दिशा-निर्देशों के तहत ‘अधिग्रहण वित्तपोषण’ के दायरे को व्यापक बनाते हुए इसमें विलय और समामेलन को भी शामिल किया गया है। आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि यह ऋण सुविधा केवल गैर-वित्तीय कंपनियों पर नियंत्रण हासिल करने के उद्देश्य से दी जाएगी। यदि फंडिंग किसी सहायक कंपनी या स्पेशल पर्पस व्हीकल (SPV) के माध्यम से की जाती है, तो बैंकों के लिए मूल कंपनी से ‘कॉर्पोरेट गारंटी’ लेना अनिवार्य होगा। पुनर्वित्त (Refinancing) के मामले में भी नियम कड़े किए गए हैं; बैंक केवल तभी पुनर्वित्त कर सकेंगे जब अधिग्रहण प्रक्रिया पूरी हो जाए और लक्ष्य कंपनी पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो जाए।
आरबीआई के इस नए ढांचे का एक प्रमुख उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली में प्रणालीगत जोखिमों को कम करना है। इसके तहत शेयरों, रियल एस्टेट निवेश ट्रस्ट (REITs) और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश ट्रस्ट (InvITs) की इकाइयों के विरुद्ध दिए जाने वाले व्यक्तिगत ऋणों की सीमा को तर्कसंगत बनाया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि कार्यान्वयन में इस देरी से बैंकों को अपनी बैलेंस शीट और जोखिम मूल्यांकन मॉडल को वैश्विक मानकों के अनुरूप अपडेट करने का मौका मिलेगा। 13 फरवरी को घोषित इन नियमों का लक्ष्य भारतीय कॉर्पोरेट अधिग्रहण प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और व्यवस्थित बनाना है।

