जयंत राय चौधरी से
नयी दिल्ली, 26 मार्च (वार्ता) बंगलादेश आज ही के दिन लगभग 55 साल पहले एक स्वतंत्र गणराज्य घोषित हुआ था। वर्ष 1971 में पाकिस्तान के सैन्य शासक जनरल याह्या खान ने देश के पूर्वी हिस्से में सभी राजनीतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया और राजनीतिक नेताओं तथा आम नागरिकों पर क्रूर दमन शुरू कर दिया, तो अवामी लीग के नेता शेख मुजीबुर रहमान ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। इस घोषणा को अगले दिन त्रिपुरा के साथ भारतीय सीमा के निकट स्थित कलुरघाट के एक रेडियो स्टेशन से तत्कालीन मेजर जिया उर रहमान ने पढ़कर सुनाया था। गौरतलब है कि मेजर जिया उर रहमान के ही पुत्र तारिक जिया यानी तारिक रहमान हाल ही में हुए चुनावों में बंगलादेश के प्रधानमंत्री चुने गये हैं।
उस समय की भारतीय समाचार एजेंसियों की रिपोर्टों के अनुसार, ठीक इसी दिन एक तरफ़ पश्चिमी पाकिस्तान की नियमित सेना और दूसरी तरफ़ पूर्वी पाकिस्तान की पुलिस तथा अर्धसैनिक बल ‘ईस्ट पाकिस्तानी राइफल्स’ के बीच कई इलाकों में लड़ाई छिड़ गई थी। इन इलाकों में चटगाँव, कोमिला और रंगपुर के साथ-साथ राजधानी ढाका भी शामिल था। रिपोर्टों में बताया गया कि पश्चिमी पाकिस्तान से कम से कम 10,000 सैनिकों को पूर्वी पाकिस्तान भेजा गया था, जिससे वहाँ तैनात नियमित सैनिकों की कुल संख्या बढ़कर लगभग 70,000 हो गई थी। ये सैनिक टैंकों, तोपखाने और मोर्टार के अलावा सामान्य राइफलों और मशीनगनों से भी लैस थे।
उन्होंने अपने ही पूर्वी पाकिस्तानी वर्दीधारी साथियों और आम नागरिकों पर हमला कर दिया। ये हमले राष्ट्रपति याह्या खान, शेख मुजीब और पश्चिमी पाकिस्तान की प्रमुख पार्टी ‘पाकिस्तान पीपल्स पार्टी’ के अध्यक्ष ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के बीच चल रही बातचीत में “एक गंभीर गतिरोध” पैदा होने के बाद शुरू हुए थे। ‘स्वाधीन बांग्ला बेतार केंद्र’ के नाम से किए गये उस प्रसारण में ( जिसमें आज़ादी की घोषणा की गई थी) यह दावा किया गया कि बंगलादेश की आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे लड़ाकों ने सिलहट, जेसोर, बारीसाल और खुलना शहरों के साथ-साथ चटगाँव और कोमिला में भी पश्चिमी पाकिस्तानी सैनिकों को घेर लिया है। उस प्रसारण में कहा गया, “शेख मुजीबुर रहमान ही स्वतंत्र बंगलादेश की जनता के एकमात्र नेता हैं और पश्चिमी पाकिस्तानियों की क्रूर तानाशाही से देश को बचाने के लिए समाज के सभी वर्गों के लोगों को उनके आदेशों का पालन करना चाहिए।”
प्रसारण में अवामी लीग के उस फ़ैसले को दोहराया गया, जिसके तहत पूर्वी हिस्से में हड़ताल का आयोजन किया जाना था। यह हड़ताल पिछले कुछ दिनों में सेना द्वारा किए गए हमलों के विरोध में थी, जिनमें कथित तौर पर 100 से ज़्यादा आम नागरिकों की मौत हो गयी थी। इससे पहले, 26 मार्च 1971 की सुबह-सुबह ही श्री मुजीब रहमान को सेना की एक टुकड़ी ने ढाका के धनमंडी स्थित उनके घर से उठा लिया और ‘बिग बर्ड’ नाम के एक अचानक चलाए गए अभियान के तहत उन्हें हवाई जहाज़ से पश्चिमी पाकिस्तान ले जाकर जेल में डाल दिया। शहर के दूसरे हिस्सों में उस रात देर तक सेना के वाहन और वायरलेस सेट लगी जीपें सड़कों पर गड़गड़ाती हुई दौड़ती रहीं। उनके इंजनों की आवाज़ ने उस तनावपूर्ण और चौकस शांति को भंग कर दिया। ढाका के बाहरी इलाके में स्थित सैन्य छावनी से लगभग एक किलोमीटर दूर, ‘फ़ार्मगेट’ नाम की जगह के पास आगे बढ़ रही पाकिस्तानी सेना की पहली टुकड़ी को एक अचानक आई रुकावट का सामना करना पड़ा। पेड़ों के कटे हुए तनों, टूटी-फूटी कारों और यहाँ तक कि एक फँसे हुए स्टीमरोलर से बनाया गया एक कामचलाऊ बैरिकेड ( जिसे विद्यार्थियों ने बड़ी तेज़ी से इकट्ठा करके बनाया था) से रोकने की कोशिश की गयी। इसके पीछे सैकड़ों आम लोग खड़े थे, जो विरोध में नारे लगा रहे थे। इसके तुरंत बाद ही गोलीबारी शुरू हो गई, जिसमें लोगों को अंधाधुंध मारा गया।
इसके बाद सेना की टुकड़ियों ने ‘पुराने ढाका’ में आम नागरिकों के घरों पर हमला किया, जिसमें हज़ारों लोग मारे गए। घरों में आग लगाने और लोगों को बाहर भागने पर मजबूर करने के लिए ‘फ़्लेमथ्रोअर’ (आग फेंकने वाले यंत्र) का इस्तेमाल किया गया, और जैसे ही लोग बाहर निकले, उन्हें गोलियों से भून दिया गया। ढाका विश्वविद्यालय में हिंसा ने और भी ज़्यादा सोची-समझी और सुनियोजित शक्ल अख़्तियार कर ली। सेना के जवान ज़बरदस्ती छात्रों के हॉस्टलों में घुस गए। वहाँ रहने वालों को उनके कमरों से बाहर खींच लिया गया। वहां खड़े कुछ को वहीं गोली मार दी गयी, जबकि दूसरों को बाहर इकट्ठा करने के बाद मौत के घाट उतार दिया गया। संकाय सदस्यों को उनके क्वार्टरों में ढूँढ़-ढूँढ़कर मारा गया। सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक ‘शहीद मीनार’ पूरी तरह से मलबे में तब्दील हो गया। ‘जगन्नाथ हॉल’ में विद्यार्थियों को एक लाइन में खड़ा करके उन्हें मौत की सज़ा दी गई। मारे गए लोगों में दार्शनिक गोविंद चंद्र देव और जाने-माने शिक्षाविद ज्योतिर्मय गुहाठाकुरता भी शामिल थे।
पाकिस्तानी सेना द्वारा गिरफ़्तार किये जाने से ठीक पहले शेख मुजीबुर रहमान ने पाकिस्तान से अलग होने की दिशा तय करने के लिए एक निर्णायक कदम उठाया था। पच्चीस मार्च की देर रात जब पूर्वी पाकिस्तान में सैन्य अभियान शुरू हुए, तो उन्होंने अपने समर्थकों को विरोध करने का निर्देश दिया और आज़ादी की घोषणा जारी की। द टाइम्स’ सहित प्रमुख अंतरराष्ट्रीय अखबारों में छपी रिपोर्टों में गुप्त रेडियो प्रसारणों का हवाला दिया गया, जिनमें दावा किया गया था कि शेख मुजीबुर रहमान ने पूर्वी पाकिस्तान के करोड़ों लोगों को एक संप्रभु, स्वतंत्र बंगलादेश का नागरिक घोषित कर दिया है। जनरल याह्या खान ने अपने लोगों के लिए एक अलग प्रसारण में चेतावनी दी कि पूर्वी पाकिस्तान में स्थिति बहुत गंभीर मोड़ ले चुकी है। उन्होंने कहा, “मैंने सशस्त्र बलों को अपना काम करने और सरकार के अधिकार को पूरी तरह से बहाल करने का आदेश दिया है।” ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ नामक सैन्य कार्रवाई में बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों, पत्रकारों; अवामी लीग के नेताओं और हिंदुओं को विशेष रूप से निशाना बनाया गया। यह कार्रवाई तेज़ी से पूरे ग्रामीण इलाकों में फैल गई, जिसके चलते लाखों लोग अपनी सुरक्षा के लिए सीमा पार करके भारत की ओर भागने लगे। समय के साथ जैसे-जैसे आज़ादी के समर्थक लड़ाके और अवामी लीग के कार्यकर्ता शरणार्थियों के साथ भारत आने लगे, एक ‘मुक्ति वाहिनी’ का गठन किया गया। इसके साथ ही, बंगलादेश की एक अंतरिम सरकार भी बनाई गयी, जिसने मध्य कोलकाता में अपना मुख्यालय स्थापित किया। इसके अलावा, बैलीगंज सर्कुलर रोड पर एक किराए के मकान से एक गुप्त रेडियो स्टेशन भी संचालित किया जाने लगा। सीमा के किनारे शरणार्थी शिविर और विद्रोही प्रशिक्षण अड्डे बन गए, और पूर्वी पाकिस्तान को आज़ाद कराने के लिए युद्ध शुरू हो गया।

