व्यवसाय में ब्रांड आइडेंटिटी की धोखाधड़ी से उपभोक्ता व बाजार में पडता है असर

जबलपुर। दूसरी कंपनी की ब्रांड आइडेंटिटी का उपयोग किये जाने के आरोप पर धोखाधडी,जालसाजी सहित कॉपी राइट एक्ट के तहत प्रकरण दर्ज कर न्यायालय में चालान पेश किये जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गयी थी। याचिका में कहा गया था कि विवाद ट्रेडमार्क या कॉपीराइट के कथित उल्लंघन से जुड़ा है इसलिए सिविल नेचर का है। हाईकोर्ट जस्टिस बी पी षर्मा ने याचिका को खारिज करते हुए अपने आदेश में कहा है कि व्यवसाय में ब्रांड आइडेंटिटी की धोखाधड़ी से उपभोक्ता व बाजार में असर पडता है।

जबलपुर के चरगवां थानान्तर्गत धारा 420, 468 और 471 के साथ-साथ कॉपीराइट एक्ट, 1957 के सेक्शन 51, 63 और 68 के अपराधिक प्रकरण दर्ज किये जाने के खिलाफ श्रीमती माया गुप्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की गयी थी। याचिका में कहा गया था कि उनकी चरगवां स्थित पॉलीसेट पाइप इंडस्ट्रीज में पाइप और उससे जुड़े प्लास्टिक प्रोडक्ट बनाते थे। उस पर आरोप है कि जैन इरिगेशन सिस्टम्स लिमिटेड से जुड़ी ब्रांड आइडेंटिटी और रेप्युटेशन का गलत इस्तेमाल करके बेईमानी से पाइप बनाए और मार्केट में सर्कुलेट किए। इस तरह कस्टमर्स को यह यकीन दिलाया कि ये प्रोडक्ट असली सामान हैं जो उस कंपनी ने बनाए हैं।

याचिका में कहा गया था कि किसी उपभोक्ता ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज नहीं कराई है। संबंधित कंपनी ने ब्रांड आइडेंटिटी के उपयोग की शिकायत दर्ज करवाई है। जो दो कंपनी के बीच का सिविल नेचर का मामला है। याचिका में राहत चाही गयी थी कि उसके खिलाफ दर्ज अपराधिक प्रकरण को निरस्त किया जाये।

याचिका को खारिज करते हुए एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि पुलिस ने जांच के बाद न्यायालय में चार्जशीट दायर की है। जिसमें पहली नजर में सबूत होने का संकेत मिलता है। आरोप एक जानी-मानी कंपनी की ब्रांड पहचान का गलत इस्तेमाल करके सामान बनाने और बेचने से जुड़े हैं। यह मामला सिर्फ़ टाइटल में कॉपीराइट के सवाल तक सीमित नहीं है, बल्कि कमर्शियल एक्टिविटी में कथित धोखाधड़ी से भी जुड़ा है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का हवाला देते हुए एकलपीठ ने कहा है कि हाई कोर्ट ऐसी कार्रवाई रद्द कर सकता है जहाँ विवाद ज़्यादातर सिविल नेचर का हो और प्रॉसिक्यूशन जारी रखने से कोई फ़ायदा नहीं होगा। हालाँकि, कोर्ट ने साथ ही चेतावनी दी कि धोखाधड़ी, आर्थिक गलत काम या बड़े पैमाने पर समाज को प्रभावित करने वाले गंभीर अपराधों को आम तौर पर सिर्फ़ इसलिए रद्द नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि विवाद में सिविल पहलू हैं।

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