नई दिल्ली | भारत इस समय एक गंभीर ऊर्जा संकट की ओर बढ़ रहा है, जिसका मुख्य कारण एलपीजी खपत में हुई रिकॉर्ड बढ़ोतरी और स्थिर घरेलू उत्पादन है। पिछले एक दशक में गैस की खपत 19.6 MMT से बढ़कर 31.3 MMT तक पहुँच गई है, लेकिन भारत अपनी जरूरत का लगभग 60% हिस्सा आज भी विदेशों से आयात करता है। वर्तमान में ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच जारी युद्ध ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को असुरक्षित बना दिया है। चिंता की बात यह है कि भारत का 85% एलपीजी आयात इसी संकरे जलमार्ग से होता है, जहाँ तनाव बढ़ने से सप्लाई चेन पूरी तरह ठप होने का खतरा मंडरा रहा है।
देश में एलपीजी भंडारण की स्थिति भी काफी नाजुक है। आंकड़ों के अनुसार, भारत के पास मौजूद कुल गैस भंडार केवल 18 दिनों की राष्ट्रीय मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। उत्तर भारत की स्थिति और भी विकट है, जहाँ मात्र 8 दिनों का स्टॉक बचा है। यदि युद्ध के कारण खाड़ी देशों (कतर और यूएई) से आने वाले जहाजों का रास्ता रुकता है, तो घरेलू रसोइयों के साथ-साथ फर्टिलाइजर और सिरेमिक जैसे बड़े उद्योगों में उत्पादन पूरी तरह बंद हो सकता है। हालांकि सरकार पैनिक न करने की सलाह दे रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर गैस एजेंसियों के बाहर लगती लंबी कतारें कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं।
संसद में इस मुद्दे को लेकर विपक्षी दलों ने जोरदार प्रदर्शन किया और मांग की कि एलपीजी की कमी पर तुरंत बहस कराई जाए। कांग्रेस समेत अन्य दलों का आरोप है कि सरकार वैकल्पिक मार्गों की तलाश करने में विफल रही है। इसके जवाब में पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने दावा किया कि देश में गैस की कोई कमी नहीं है और घरेलू आपूर्ति पूरी तरह सुरक्षित है। सरकार के अनुसार, अधिक बुकिंग पैनिक बाइंग की वजह से हो रही है, न कि स्टॉक की कमी के कारण। बावजूद इसके, विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर निर्भरता कम किए बिना भारत का ऊर्जा भविष्य सुरक्षित नहीं है।

