जबलपुर: मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में साफ किया कि अधीनस्थ अदालत द्वारा लिए गए संज्ञान में हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं बनता। इसी के साथ नगरपालिका परिषद शहडोल के चुनाव के दौरान साइकिल चुनाव चिन्ह आक्षेप मामले में मानहानि प्रकरण चलाए जाने पर मुहर लगा दी। इस आदेश से दिनेश दीक्षित को झटका लगा, जबकि राकेश सिंह बघेल को राहत मिली।
अधिवक्ता योगेश सिंह बघेल ने दलील दी कि नगर पालिका परिषद शहडोल के चुनाव में दिनेश दीक्षित व राकेश सिंह बघेल दोनों अध्यक्ष पद के उम्मीदवार थे, हालांकि दोनों चुनाव में पराजित हो गए। इसके बाद आवेदक ने पुलिस अधीक्षक शहडोल को लिखित शिकायत भेजते हुए प्रतिवादियों पर जाली दस्तावेजों के आधार पर साइकिल चुनाव चिन्ह प्राप्त करने और धोखाधड़ी करने के आरोप लगाए। साथ ही इस संबंध में निजी शिकायत भी दर्ज कराई गई, जिसे बाद में आवेदक द्वारा वापस ले लिया गया। इसके पश्चात प्रतिवादियों ने आरोप लगाया कि झूठे और मान हानिकारक आरोप लगाकर उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया गया, जिसके आधार पर न्यायिक मजिस्ट्रेट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 500 अंतर्गत मानहानि प्रकरण में संज्ञान लिया।
राकेश सिंह व अन्य प्रतिवादी राशिद खान के ओर से अधिवक्ता योगेश सिंह बघेल ने साफ किया कि चुनाव हारने के बाद दिनेश दीक्षित ने बिना किसी ठोस आधार के गंभीर आरोप लगाए और उन्हें समाचार पत्रों में प्रकाशित भी कराया, जिससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित हुई। साथ ही यह भी कहा गया कि नामांकन की जांच के समय कोई आपत्ति नहीं उठाई गई थी और बाद में की गई शिकायत को स्वयं आवेदक ने वापस ले लिया, जो आरोपों की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़ा करता है।
अपने पक्ष में प्रतिवादियों ने हाईकोर्ट मध्य प्रदेश जबलपुर के निर्णय शिवराज सिंह बनाम विवेक कृष्ण तनखा का हवाला दिया। वहीं दिनेश दीक्षित की ओर से यह तर्क दिया गया कि शिकायत सार्वजनिक हित और चुनाव से जुड़े मुद्दे पर सद्भावना में की गई थी और यह भारतीय दंड संहिता की धारा 499 के अपवादों के अंतर्गत आती है। इसके समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय किशोर बालकृषानंद पर भरोसा किया गया। आदेश के पैरा-नो में न्यायालय ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि आवेदक दिनेश दीक्षित द्वारा पहले राकेश सिंह व अन्य के विरुद्ध एक निजी शिकायत सीजेएम न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गई थी।
बाद में उक्त शिकायत को स्वयं दिनेश दीक्षित ने यह कहते हुए वापस ले लिया कि वे अधिवक्ताओं के बीच अनावश्यक विवाद और कानूनी बिरादरी में मतभेद उत्पन्न होने से बचना चाहते हैं। न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि आवेदक उचित समझें तो विधि के अनुसार, निर्धारित सीमा-अवधि और अन्य कानूनी शर्तों के अधीन रहते हुएए उस शिकायत के संबंध में उपलब्ध वैधानिक उपाय अपनाने के लिए स्वतंत्र हैं। न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए कहा कि रिकार्ड पर उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट होता है कि प्रतिवादियों के विरुद्ध लगाए गए आरोपों का संप्रेषण तीसरे व्यक्तियों तक हुआ और इससे उनकी प्रतिष्ठा प्रभावित होने की संभावना बनती है। ऐसे में यह तय करना कि आरोप सत्य थे या सद्भावना में लगाए गए थे, साक्ष्य के आधार पर ट्रायल के दौरान ही तय किया जा सकता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अधीनस्थ अदालत के आदेशों को सही ठहराते हुए याचिका निरस्त कर दी और मानहानि के मामले में ट्रायल आगे बढऩे का रास्ता साफ कर दिया।
