पठारी: प्राकृतिक सौंदर्य की गोद में गौड़ राजाओं ने जीवन दायक तालाब का निर्माण कराया था. जिसकी वैभवता और सुंदरता की निशानियां गवाही दे रही हैं जो अमृत समान खनिज जल का पेयजल स्रोत था. जलीय एवं जन जीवन के लिए बरदान साबित हो रहा था.सदियों से नगर की प्यास बुझाने वाला तालाब शासन प्रशासन और लोगों की उपेक्षा उदासीनता का शिकार हो गया
राजतंत्र में थे तालाब संरक्षण के लिए नियम कायदेबुजुर्ग बताते हैं कि राजतंत्र के दौरान तालाब संरक्षण के लिए विशेष नियम कायदे लागू थे. जिसके तहत तालाब के पानी का उपयोग कैसे किया जाना है तथा जल शुद्धिकरण जो अब अपने अस्तित्व को के लिए क्या-क्या उपाय किए लिए पहाड़ पर खोदी गई जाना है. तालाब भराव के नाली की सफाई आदि श्रमदान के द्वारा की जाती थी. लोगों द्वारा श्रमदान भी किया जाता था.
बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
पठारी की भूगर्भीय जलस्तर संरक्षित करने के लिए तालाब के संरक्षण की अत्यंत आवश्यकता है। मनोज नामदेव बताते हैं कि मध्यकाल में बड़ोह पठारी के बीच ज्ञाननाथ पर्वत की तलहटी में तालाब का निर्माण पठारी किले के निर्माण के दौरान किया गया था गोंडवाना साम्राज्य में तालाब, बांध, नहरों
उत्सवों का होता था आयोजन
तालाब के चारों ओर सुंदर घाटों का निर्माण किया गया था. जिसमें चार कुआं और एक बावड़ी का निर्माण किया गया था. जिसमें 2 कुएं तालाब के बाहर और दो कोई जलमग्न हैं. तालाब में 11 शिवलिंग जलमग्न है। जिन पर निरंतर जलाभिषेक किया जा रहा है. वहीं तालाब के किनारे पर मंदिरों का भी निर्माण किया गया है. विशेष तीज त्योहारों पर तालाब पर दीपदान एवं अन्य प्रकार के महोत्सव का आयोजन किया जाता था बताया जाता है कि राजतंत्र में स्वर्ण सिक्का प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता था.
और किलों का निर्माण प्राथमिकता से कराया जाता था जिसके तहत पठारी में भी निर्माण कराया गया. किले में गौड़ साम्राज्य से संबंधित कई निशानियां मौजूद है
