महाकौशल की डायरी
अविनाश दीक्षित
आने वाले कुछ दिनों में होने वाले बवंडर की चिंता, शंका अब जिला, नगर निगम व पुलिस प्रशासन को अभी से सताने लगी है। इसकी मुख्य वजह मदनमहल पहाड़ी पर जमे लोगों के आशियाने ढहाने का प्रशासन के द्वारा अल्टीमेटम देना। सुप्रीम कोर्ट की मुहर के बाद अब मदनमहल पहाड़ी पर कब्जा कर रह रहे कई लोगों के आशियाने जल्द ही ढहने वाले हैं जिसको लेकर कब्जाधारियों के खेमे में काफी उथल पुथल मची हुई है। खबर है कि कब्जाधारियों ने प्रशासन की अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई का विरोध करने बड़ी रणनीति बनाई है जिसको लेकर कयास लगाए जाने लगे हैं कि जिस दिन भी प्रशासन का अमला दल बल के साथ कार्रवाई के लिए मदनमहल पहाड़ी के पास पहुंचेगा तो उसी दिन कब्जाधारियों द्वारा अपनी ताकत, एकजुटता का परिचय दिया जाएगा। सूत्रों की माने तो कार्रवाई वाला दिन प्रशासन के लिए काफी सरदर्द वाला हो सकता है। कार्रवाई करना अब प्रशासन की मजबूरी हो गया है क्योंकि मप्र हाईकोर्ट के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने मदनमहल पहाड़ी पर जमे अवैध कब्जों को हटाने की बात पर मुहर लगा दी है। लेकिन ये कार्रवाई धरातल में पूरी करना प्रशासन के लिए किसी टेढी खीर से कम नहीं है। निगम, जिला व पुलिस प्रशासन के खुद आला अफसर इस हकीकत से वाकिफ़ हैं।
वहीं खबर ये भी है कि कलेक्टर के निर्देश पर नगर निगम की टीमें , पुलिस फोर्स व अन्य सुरक्षा व्यवस्था की जा चुकी है ताकि कानून व्यवस्था बनने पर उससे निपटा जा सके। जानकारी अनुसार प्रशासन ने सूची तैयार कर ली है जिनके कब्जे मदनमहल पहाड़ी से हटाना है। सवाल ये खड़ा हो गया है कि क्या हालात सामान्य करके कब्जाधारियों के आशियाने ढहा दिए जाएंगे या फिर किसी बवंडर के बीच ये कार्रवाई संभव होगी। जानकारों का मानना है कि पर्दे के पीछे से चल रही राजनीति के बीच मदनमहल पहाड़ी से कब्जाधारियों को संतुलित कर उनके आशियाने ढहाना प्रशासन के लिए बिल्कुल आसान नहीं होगा। विदित हो कि सुप्रीम कोर्ट ने शांति बाई शर्मा व अन्य द्वारा दायर की गई याचिका पर 24 फरवरी को सुनवाई करते हुए राज्य शासन को मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के मदन महल पहाड़ी को अतिक्रमण मुक्त करने के आदेश का शीघ्र अनुपालन करने के निर्देश दे दिए हैं।
नहीं तो बुझ जातीं मेडिकल में हजारों जिंदगियां…..
जबलपुर संभाग के सबसे बड़े नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल अस्पताल के पीछे बायोमेडिकल स्टोर के बाहर कचरे के ढेर में भड़की विकराल आग ने जहां एक बार फिर से मेडिकल प्रबंधन की लापरवाही की पोल खोलकर रखी दी तो वहीं दूसरी तरफ फायर अमले की सक्रियता ने विकराल आग पर समय रहते काबू पाते हुए मेडिकल अस्पताल में भर्ती हजारों की संख्या में मरीजों की जान बचा ली। क्योंकि कचरे के ढेर में भड़की आग अगर मेडिकल की बिल्डिंग तक पहुंचती तो बहुत बड़ी दुर्घटना से बिल्कुल भी इंकार नहीं किया जा सकता था। प्रत्यक्षदर्शियों की माने तो कचरे के ढेर से लगातार शीशियां फूटने और धमाके जैसी आवाजें आती रहीं। जिससे साफ था कि वहां सामान्य कचरे के साथ बायोमेडिकल वेस्ट भी बड़ी मात्रा में मौजूद था। आग देर रात लगी थी और कई घंटों धधकती रही लेकिन मेडिकल प्रशासन बेखबर रहा।
मामले में अभी तक मेडिकल डीन डॉ नवनीत सक्सेना द्वारा जिम्मेदार अधिकारी को अभी तक तलब नहीं किया गया और न ही उस पर कार्रवाई की गई, कार्रवाई इसलिए जरूरी है क्योंकि मेडिकल अस्पताल के पीछे बायोमेडिकल स्टोर के बाहर पिछले कई महीनों से एकत्रित करके कचरा रखा गया था और जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा एक बार भी यहां का निरीक्षण नहीं किया गया। जानकारों का कहना है कि कचरे को समय समय पर उठाना चाहिए था जो कि बिल्कुल नहीं किया गया। नियम की बात करें तो जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 के तहत पीले, लाल, सफेद और नीले बैग में कचरे का पृथक्करण अनिवार्य है लेकिन मेडिकल में खुले में कचरे के पहाड़ ने जिम्मेदारों की उदासीन कार्यशैली को भी उजागर किया। चर्चाएं ये भी हैं कि मेडिकल डीन द्वारा इसलिए अभी तक मामले में चुप्पी साधी गई है क्योंकि शंका है कि कचरे के ढेर को नष्ट करने उसमें जानबूझकर आग लगाई गई है। वहीं नियमों के तहत बायोमेडिकल बचरे में आग लगाई जा रही है, तो यह गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।
लहलहाते हुए मिली अफीम की फसल....
चने की करीब 5 एकड़ जमीन पर जब पुलिस महकमे के अफसरों, कर्मचारियों ने लहलहाते हुए अफीम की फसल देखी तो उनके होश उड़ गए। दरअसल पुलिस को सूचना मिली कि दमोह जिले के तेजगढ़ थाना अंतर्गत पुलिस चौकी इमलिया घाट क्षेत्र के ग्राम मुराडी, ग्राम पंचायत सुहेला में चने के लगभग 5 एकड़ भूमि पर अफीम की फसल उगाई गई है। बस फिर क्या था पुलिस के हाथ लगा सोने का अंडा.. सूचना पर तत्काल पुलिस ने मौके पर दबिश दी और अफीम की फसल को जप्त किया। ये पूरा मामला दमोह, कटनी, जबलपुर, सिवनी सहित आसपास के अन्य इलाकों में काफी सुर्खियों में रहा।
चर्चाएं ये भी हुईं कि महाकौशल के अन्य इलाकों में भी ऐसे ही कई खेतों में अफीम की फसलें आबाद हैं लेकिन पुलिस अफसरों तक अच्छी खासी रकम पहुंचाने के बाद वे बेनकाब नहीं हो पातीं हैं। सर्वविदित है कि अवैध अफीम की खेती न केवल कानूनन अपराध है, बल्कि समाज में नशे की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाला गंभीर कृत्य भी है। पूरी कार्रवाई में अब ये सवाल अभी भी बनकर खड़ा है कि पुलिस किन किन लोगों के नामों का खुलासा करती है जो इस खेल में शामिल हैं। हालांकि अभी स्थानीय पुलिस की ओर से किसी प्रभावशील का नाम सार्वजनिक नहीं किया गया है सिर्फ रटा रटाया डायलॉग की जांच चल रही है, यही बयान दिया गया है। स्थानीय ग्रामीणों की माने तो ये अफीम की फसल की खेती करने में भगवा खेमे के बड़े चेहरे शामिल हैं। जानकारों का कहना है कि कहीं सेटिंग की आड़ में इन प्रभावशीलों का नाम न दब जाए और आरोपी दिखावे के लिए किसी अन्य को बना दिया जाए।
