मैकाले की मानसिकता से मुक्त होकर ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य के अनुरूप खुद को ढालें शिक्षण संस्थानः प्रधान

नयी दिल्ली 20 फरवरी (वार्ता) केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शुक्रवार को उच्च शिक्षण संस्थानों से मैकाले की औपनिवेशिक शिक्षा मानसिकता से मुक्त होकर ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य के अनुरूप खुद को ढालने का आह्वान किया।

श्री प्रधान ने आज दिल्ली विश्वविद्यालय के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (एसआरसीसी) के वार्षिक प्रबंधन सम्मेलन ‘युगांतर 26’ का उद्घाटन किया। इस मौके पर उन्होंने द्विवर्षीय वैश्विक व्यापार संचालन में स्नातकोत्तर डिप्लोमा (पीजीडीजीबीओ) को पूर्णकालिक स्नातकोत्तर डिग्री कार्यक्रम में परिवर्तित करने की औपचारिक घोषणा की। श्री प्रधान ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी ) को भारत की शैक्षणिक संरचना में व्यापक और संरचनात्मक परिवर्तन की दिशा में निर्णायक कदम बताया।

उन्होंने कहा, “हमें उस मैकालेवादी सोच से बाहर निकलना होगा, जिसने भारत को अकादमिक रूप से जकड़ रखा था। प्रधानमंत्री मोदी जी की परिकल्पना में तैयार राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारत को ‘विश्व गुरु’ बनाने की दिशा में मार्ग प्रशस्त करेगी। एसआरसीसी जैसे संस्थानों को इस परिवर्तन का नेतृत्व करना चाहिए। विकसित भारत के लक्ष्य की पूर्ति के लिए एसआरसीसी आज बीज बो रहा है।”

इस दौरान उन्होंने तकनीकी आत्मनिर्भरता पर बल देते हुए कहा कि प्रौद्योगिकी के इस युग में प्रतिस्पर्धा का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। भारत को संप्रभु एआई पारिस्थितिकी तंत्र की दिशा में आगे बढ़ना होगा। साथ ही आईआईटी मद्रास और आईआईटी बॉम्बे जैसे संस्थानों को सशक्त करते हुए स्वदेशी क्षमताओं का विकास करना होगा, ताकि भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व कर सके।

उन्होंने विश्वविद्यालयों से अनुसंधान, पेटेंट, स्टार्टअप नवाचार और एआई-आधारित नवाचार को अपनी शैक्षणिक संरचना का अभिन्न अंग बनाने का आह्वान किया। ‘युगांतर 26’ विषय “स्थिरता और स्टार्टअप नवाचार के लिए कृत्रिम बुद्धिमता (एआई)” था।

श्रृधर श्रीराम सभागार में आयोजित इस समारोह में शिक्षा मंत्री मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता डीयू के कुलपति योगेश सिंह ने की। इस अवसर पर वरिष्ठ प्राध्यापकगण, उद्योग जगत के प्रतिनिधि, पूर्व छात्र और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। साथ ही डॉ. मिशा गोविल (जीबीओ समन्वयक), डॉ. सपना बंसल (संयोजक, युगांतर 2026) तथा डॉ. सुनीता शर्मा (सह-संयोजक) भी कार्यक्रम में मौजूद रहीं।

इस दौरान श्री प्रधान ने घोषणा की कि एसआरसीसी द्वारा संचालित दो वर्षीय पीजीडीजीबीओ कार्यक्रम को अब औपचारिक रूप से स्नातकोत्तर डिग्री कार्यक्रम में परिवर्तित किया जाएगा। यह निर्णय राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप उच्च शिक्षा को वैश्विक मानकों के समकक्ष लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस परिवर्तन से न केवल कार्यक्रम की शैक्षणिक मान्यता सुदृढ़ होगी, बल्कि शोध, नवाचार और अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक समकक्षता के नए अवसर भी खुलेंगे।

वहीं, प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालयों को शोध को व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य उत्पादों में परिवर्तित करना चाहिए। उन्होंने कहा, “युवा मन की सुरक्षा तीन शब्दों में निहित है — नवाचार, रचनात्मकता और मौलिकता। विश्वविद्यालयों को केवल शोधपत्रों तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि उन्हें पेटेंट, प्रोटोटाइप और टिकाऊ व्यावसायिक उत्पाद विकसित करने होंगे।” उन्होंने तकनीकी परिवर्तनों का विरोध करने की प्रवृत्ति से बचने और उद्योग–विश्वविद्यालय सहयोग को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

शिक्षा मंत्री ने ‘विकसित भारत स्टार्टअप एक्सपो 2026’ का भी अवलोकन किया, जहाँ विद्यार्थियों द्वारा विकसित नवाचार प्रोटोटाइप प्रदर्शित किए गए। एसआरसीसी जीबीओ को मास्टर डिग्री में उन्नत करने की घोषणा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप सुधारों के संकल्प के साथ, ‘युगांतर ’26’ ने विकसित भारत 2047 की व्यापक रूपरेखा में उच्च शिक्षा की निर्णायक भूमिका को रेखांकित किया।सिमरित कौर, प्राचार्या, एसआरसीसी ने की।

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