
पांढुरना,18 फरवरी,शब्द जब मंत्र बनते हैं और जिंदगी बदलने में महती भूमिका निभाते हैं तब डा श्रीमती सरिता बोबड़े और विजय बोबड़े के जीवन में शब्द भी सरस्वती बनकर उतर आते हैं। विजय बोबड़े की बड़ चिचोली से महू तक की यात्रा कई विजयों की साक्षी बनी है। महू संगठन को खड़ा करने से लेकर अपने दोनों अनुजों को अपने पैरों पर खड़ा करने जैसी पहल के साथ स्वयं के लड़खड़ाते कदमों को इतनी ताकत दी गई कि घर- परिवार के दायित्वों का बड़े से बड़ा बोझ भी भलीभाँति उठाने में सक्षम वे हो सकें।
आपकी धर्म पत्नी श्रीमती सरिता बोबड़े 1996 में आपके जीवन में आई तो उस समय वह 10 वीं फेल थीं और आपके दो सहकर्मियों की भी उसी साल शादी हुई थी जिनकी पत्नियां एमए पास थीं। तब आपके सिनियर केरला निवासी कर्मचारी द्वारा कहे गये शब्द कि पत्नी का कम से कम ग्रेजुएशन तक शिक्षित होना जरूरी है
ताकि वह घर परिवार में बच्चों की पढ़ाई- लिखाई का ध्यान रख सकें।” विजय बोबड़े की प्रेरणा बनें।
सबसे पहले विजय बोबड़े द्वारा जब श्रीमती सरिता बोबड़े को पीएचडी अवार्ड होने और अब तक प्राप्त शिक्षा और बच्चों की जानकारी केरला के सहकर्मी से साझा की गई गया ।
केरल में निवासरत उक्त व्यक्ति की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए और उनके द्वारा रुंधे गले से ढेर सारा आशीर्वाद दिया गया। सुखवाड़ा के पास वह आडियो रिकार्डिंग सुरक्षित है।
इसी प्रेरणा और आशीर्वाद से दसवीं फेल मेरी पत्नी ने आज देवी अहिल्या विश्व विद्यालय इंदौर में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की और मेरी बेटी एमबीबीएस करके इन्दौर में कोकिला बेन अस्पताल में सेवा कर रहीं हैं। दूसरी बेटी एमबीबीएस फाइनल में है और बेटा एमबीबीएस प्रथम वर्ष में है।
समाज की इस अहिल्या ने इंदौर की अहिल्या बाई को अपने जीवन में साकार किया। और देवी सीता की तरह अपने बच्चों को शिक्षित किया है।
डा सरिता बोबड़े राष्ट्रीय भर्तृहरि विक्रम भोज पुरस्कार समिति भारत की सचिव है और हर आयोजन में अपनी उपस्थिति से समिति को गौरवान्वित करती है। ज्ञात हो, पुरस्कार समिति समाज की ऐसी पहली समिति है जिसमें अध्यक्ष और सचिव दोनों महिलाएँ हैं। पुरस्कार समिति की सफलता का श्रेय संभवतः इन्हीं मातृ शक्तियों को जाता है।
