ढास परंपरा है बेहद खास, आदिवासी समाज में सामूहिक सहयोग की मिसाल

बड़वानी। पश्चिमी मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचल में सदियों पुरानी ‘ढास’ परंपरा आज भी जीवंत है। सामूहिक सहयोग और निस्वार्थ सेवा का प्रतीक यह परंपरा मुख्यतः बारेला, भील और भिलाला समुदायों में प्रचलित है।

हाल ही में बड़वानी जिला मुख्यालय से करीब 70 किमी दूर कामोद गांव में ग्रामीणों ने इसी परंपरा के तहत बुल सिंह आर्य के मकान की छत निर्माण में सामूहिक श्रमदान किया। गांव के लोगों ने मिलकर बांस का ढांचा तैयार किया और उस पर खपरैल की टाइलें बिछाईं। बुल सिंह के साढ़ू भाई एवं पूर्व मंडी सदस्य पारस राम सेनानी ने बताया कि सामान्यतः गड्ढा खोदने से लेकर नींव तैयार करने, लकड़ी के खंभे लगाने, छत का ढांचा बनाने और खपरैल बिछाने तक का कार्य अकेले करने में करीब दस दिन लगते, लेकिन ‘ढास’ परंपरा के कारण पूरा काम एक ही दिन में पूरा हो गया।

परंपरा के अनुसार सहायता प्राप्त करने वाला व्यक्ति कार्य पूर्ण होने के बाद शाम को सामुदायिक भोज का आयोजन कर आभार व्यक्त करता है। सेनानी ने बताया कि जब भी कोई जरूरतमंद, गरीब या आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति घर निर्माण, मरम्मत, खेत की जुताई, बुवाई या फसल कटाई जैसे कार्यों के लिए सहायता चाहता है, तो वह एक दिन पहले गांव में सूचना दे देता है। इसके बाद पूरा गांव बिना किसी भेदभाव के श्रमदान के लिए एकत्र हो जाता है।

कई बार 20 से लेकर 100 तक लोग एक साथ जुट जाते हैं, जिससे सप्ताह भर का कार्य एक दिन में पूरा हो जाता है। मेजबान की जिम्मेदारी केवल भोजन की व्यवस्था करना होती है, जिसे कई बार ग्रामीण सामूहिक रूप से ही तैयार करते हैं।

धनौरा गांव के एक किसान ने बताया कि उनके कच्चे मकान की 50×50 वर्गफुट की खपरैल छत जर्जर हो गई थी। अकेले होने के कारण वे मरम्मत नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने ‘ढास’ का आयोजन कर परिजनों व ग्रामीणों को सूचना दी और एक ही दिन में सभी ने मिलकर छत की मरम्मत कर दी, जिससे वर्षा के दौरान घर में पानी टपकने की चिंता समाप्त हो गई।

आदिवासी संस्कृति एवं परंपराओं के जानकार तथा आदिवासी मुक्ति संगठन के प्रदेश महासचिव गजानंद ब्रह्मणे ने बताया कि जो कार्य अकेले व्यक्ति को 15 से 20 दिन में करना पड़े, वह पूरे गांव के सहयोग से एक या दो दिन में पूरा हो जाता है। हाल ही में सेंधवा क्षेत्र में आग से नष्ट हुए एक मकान का पुनर्निर्माण भी इसी माध्यम से शीघ्र कर दिया गया। उन्होंने कहा कि यह परंपरा अत्यंत प्राचीन है और वे इसे बचपन से देखते आ रहे हैं।

बड़वानी के इतिहासकार एवं अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा के पूर्व कुलपति डॉ. शिवनारायण यादव के अनुसार बुवाई के मौसम में यह परंपरा विशेष रूप से लाभकारी सिद्ध होती है, क्योंकि एक साथ बुवाई करने से फसल की गुणवत्ता समान रहती है। ‘निमाड़ के जनजातीय बलिदानी योद्धा’ सहित अनेक पुस्तकों के लेखक डॉ. यादव ने कहा कि आधुनिक यांत्रिकीकरण के दौर में भी ‘ढास’ जैसी सदियों पुरानी परंपरा सामाजिक समरसता, भाईचारे और साझा जिम्मेदारी का जीवंत उदाहरण बनी हुई है। यह परंपरा आदिवासी संस्कृति की गहराई और आपसी सद्भाव की अद्वितीय मिसाल प्रस्तुत करती है।

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