
वॉशिंगटन। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित एपस्टीन प्रकरण एक बार फिर खुफिया एजेंसियों की पड़ताल के दायरे में आता दिख रहा है। हाल में सामने आए पुराने आधिकारिक पत्राचार और सूचना अधिकार (FOIA) के जवाबों ने यह संकेत दिया है कि विभिन्न एजेंसियों ने वर्षों पहले इस मामले से जुड़े रिकॉर्ड्स की खोज तो की, लेकिन सार्वजनिक रूप से किसी प्रत्यक्ष या स्वीकृत संबंध की पुष्टि नहीं की।
अमेरिकी एजेंसी CIA द्वारा 2011 में दिए गए एक लिखित जवाब में कहा गया था कि विस्तृत खोज के बावजूद ऐसा कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं मिला जो एजेंसी और एपस्टीन के बीच खुले या औपचारिक संबंध को दर्शाता हो। वहीं एजेंसियों ने कुछ सूचनाओं के अस्तित्व या अनस्तित्व पर सीधा उत्तर देने से परहेज़ किया, जिसे खुफिया तंत्र की भाषा में ग्लोमार प्रतिक्रिया कहा जाता है,अर्थात न पुष्टि, न खंडन।
इसी क्रम में NSA ने 2014 में सूचना की मांग पर यह तर्क रखा था कि किसी भी रिकॉर्ड के होने या न होने की बात स्वीकार करना राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। इन आधिकारिक रुखों ने जांच एजेंसियों के भीतर गोपनीयता और पारदर्शिता के संतुलन को लेकर नई बहस को जन्म दिया है।
दस्तावेज़ों में एपस्टीन के ईमेल और संपर्कों का उल्लेख भी सामने आया है, जिनमें रूसी प्रवासी तकनीकी निवेशकों सहित कई उच्च-स्तरीय व्यक्तियों के नाम जुड़े बताए गए। इसके बाद कुछ देशों, विशेषकर यूरोपीय क्षेत्रों में, संभावित विदेशी खुफिया कड़ियों की पुनः समीक्षा की खबरें उभरी हैं। हालांकि अब तक किसी भी एजेंसी ने प्रत्यक्ष खुफिया भूमिका या आधिकारिक संबंध का ठोस प्रमाण सार्वजनिक नहीं किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में बहु-एजेंसी समन्वय, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और गोपनीय अभिलेखों की सीमाएँ जांच की दिशा को जटिल बना देती हैं। फिलहाल स्थिति यह है कि अटकलों का दौर जारी है, लेकिन आधिकारिक स्तर पर एजेंसियां यही कह रही हैं कि उपलब्ध रिकॉर्ड्स में कोई निर्णायक साक्ष्य नहीं मिला है और सुरक्षा कारणों से अतिरिक्त खुलासा संभव नहीं है।
