
जबलपुर। अपराधिक प्रकरण में सेशन कोर्ट द्वारा आरोप तय किये जाने के बाद ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी बनाते हुए समन जारी किये जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में अपराधिक पुनर्विचार याचिका दायर की गयी थी। हाईकोर्ट जस्टिस ए के सिंह की एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि ट्रायल कोर्ट ने कानून प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल किया है। सेशन ट्रायल कोर्ट ने प्रकरण को संज्ञान में लेते हुए आरोप तय कर दिये थे। ट्रायल कोर्ट ने आरोप तय होने के बाद शिकायतकर्ता पक्ष की तरफ से पेश आवेदन पर पुन संज्ञान लेते हुए याचिकाकर्ता पिता-पुत्र के नाम अपराधियों की सूची में शामिल करने के आदेश जारी किये। आरोप तय होने के बाद प्रकरण पर दूसरी बार संज्ञान नहीं लिया जा सकता है।
छतरपुर जिले के ग्राम मुंडेरी निवासी गणेश प्रसाद गर्ग तथा उनके पुत्र बबलू मिश्रा की तरफ से दायर आपराधिक पुनर्विचार याचिका में कहा गया था कि लवकुष नगर थाने में दर्ज आपराधिक प्रकरण में सेशन ट्रायल कोर्ट के द्वारा आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करते हुए गवाही निर्धारित की थी। इसके बाद ट्रायल कोर्ट के समक्ष शिकायतकर्ता पक्ष से जितेन्द्र मिश्रा ने उन्हें आरोपी बनाने आवेदन पेश किया था। ट्रायल कोर्ट ने आवेदन को स्वीकार करते हुए उनके नाम आरोपियों की सूची में जोड़ने के आदेश देते हुए समन जारी कर दिय। आपराधिक प्रकरण में आरोप तय होने के बाद ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपियों की सूची में उनका नाम जोडने तथा समन जारी करना न्यायिक प्रक्रिया के तहत उचित नही है।
याचिकाकर्ताओं की तरफ से तर्क दिया गया कि अभियोजन के द्वारा पेष आरोपियों की सूची में उनका नाम नहीं था। पुलिस विवेचना में भी यह पाया गया था कि वह घटनास्थल में मौजूद नहीं थे। चुनावी रंजिश के कारण उन्हें फंसाया गया है। आवेदक बब्बू मिश्रा की पत्नी गांव की सरपंच है। शिकायतकर्ता की आवेदक गणेश प्रसाद मिश्रा के परिवार के सदस्य है।
एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि सेशन कोर्ट ने पहली ही संज्ञान लेते हुए चार्जशीट के साथ अटैच पुलिस दस्तावेज पर विचार करने के बाद आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करते हुए गवाही प्रारंभ करने के आदेश जारी किये थे। ट्रायल कोर्ट द्वारा पुन संज्ञान लेते हुए समन जारी करना कानून प्रक्रिया के तहत नहीं है। कानून के हिसाब से इसकी इजाज़त नहीं दी जा सकती है और आदेष को निरस्त किया जाता है।
