कपास की खेती : ग्वालियर के कृषि वैज्ञानिकों ने जगाई उम्मीद

ग्वालियर। किसानों की दिक्क़तों को महसूस करते हुए ग्वालियर स्थित राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने कपास की दो नई जैविक किस्मे तैयार की हैं. ये दोनों ही बीज ऑर्गेनिक कपास तैयार करेंगे. इनके अलावा 3-4 वेराइटी अभी शोध के दौर मे हैं जो जल्द तैयार होंगी.

कृषि विश्वविद्यालय के कुलगुरु अरविन्द कुमार शुक्ला ने बताया कि विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले खंडवा कृषि महाविद्यालय में मुख्य रूप से कॉटन पर रिसर्च की जाती है. यहीं ऑर्गेनिक कॉटन की दो वेराइटी तैयार की गई हैं. प्रोफेसर शुक्ला के अनुसार अभी बाज़ार में उपलब्ध कॉटन में पेस्टिसाइड्स का उपयोग बहुत ज़्यादा मात्र में होता है जिसकी वजह से ये रासायनिक कीटनाशक का असर पौधे के जरिए कॉटन में भी आ जाता है और जो हमारे शरीर के लिए भी नुकसानदेह है. कई लोगों को अलग-अलग तरह से एलर्जी होती है और कई लोगों को उस कॉटन से बने कपड़े पहनने में कंफर्ट महसूस नहीं होता. इसलिए हमने रिसर्च शुरू करवाई की क्या विश्वविद्यालय नॉन-जीएम वेराइटी ऑर्गेनिक रूप से पैदा किया जा सकता हैं. इस पर लगातार शोध किया जा रहा है और हमने दो वैराइटी तैयार करने में सफलता भी हासिल कर ली हैं. इनसे पूरी तरह ऑर्गेनिक कॉटन ही तैयार होगा. क्योंकि मार्केट में भी ऑर्गेनिक कॉटन की काफ़ी मांग है, ख़ास कर विदेशी मार्केट्स में.

कुलगुरु बताते हैं कि कॉटन की क्वालिटी का माप दो भागों में मापी जाती है. पहला तो इसके रेशों को ऑब्जर्व किया जाता है इनॉर्गैनिक कॉटन में फाइबर लेंथ 28mm होती है. जबकि ऑर्गेनिक कॉटन की लंबाई 29.5 मिमी तक होती है. इसके अलावा ऑर्गेनिक कपास की स्ट्रेंथ इनॉर्गैनिक कॉटन से ज़्यादा होती है. कपास में स्ट्रेंथ टेक्स इकाई में मापा जाता है. इनॉर्गैनिक कॉटन की स्ट्रेंथ जहां 25-26 टैक्स होती है, वहीं ऑर्गेनिक कपास की स्ट्रेंथ 28-30 पर टैक्स होती है. इन दोनों ही दशा में ऑर्गेनिक कॉटन की गुणवत्ता इनॉर्गैनिक कपास से बेहतर है इसलिए इसे बढ़ावा दिया जा रहा है.

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