
नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से एक बड़ा और महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाई कोर्ट द्वारा जारी उन दिशा-निर्देशों को बरकरार रखा है, जो सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर होने वाली मनमानी गिरफ्तारियों पर अंकुश लगाते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अब पुलिस किसी भी आलोचनात्मक, कड़वे या तीखे राजनीतिक भाषण पर बिना प्रारंभिक जांच किए और शिकायतकर्ता की वैधता की पुष्टि किए बिना सीधे केस दर्ज नहीं कर पाएगी। यह आदेश उन नागरिकों के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है जो डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से सरकार या सत्ताधारी दलों की नीतियों की आलोचना करते हैं।
शीर्ष अदालत का यह रुख स्पष्ट करता है कि केवल पोस्ट के आधार पर ‘मैकेनिकल’ या त्वरित गिरफ्तारी करना पूरी तरह से अस्वीकार्य है। कानून की प्रवर्तन एजेंसियों को अब आपराधिक प्रक्रिया संहिता का उपयोग करते समय आनुपातिकता के सिद्धांत का पालन करना होगा। दिशा-निर्देशों के अनुसार, पुलिस आपराधिक कानून का सहारा तभी ले सकती है जब संबंधित पोस्ट से सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा हो या वह स्पष्ट रूप से हिंसा भड़काने वाली हो। दरअसल, यह पूरा मामला तेलंगाना हाई कोर्ट के उस फैसले से उपजा था, जिसमें राज्य सरकार और मुख्यमंत्री की आलोचना करने पर दर्ज आपराधिक मामलों को यह कहते हुए रद्द कर दिया गया था कि वे केवल राजनीतिक व्यंग्य थे।
अदालत ने यह भी साफ किया कि संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को असहमति और आलोचना का अधिकार देता है। ऐसे में दुश्मनी को बढ़ावा देने, जानबूझकर अपमान करने या राजद्रोह जैसे गंभीर मामले तब तक दर्ज नहीं किए जाने चाहिए, जब तक कि हिंसा या नफरत फैलाने के प्रथम दृष्टया सबूत मौजूद न हों। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की इन गाइडलाइंस की सराहना करते हुए माना कि यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक है। इस ऐतिहासिक फैसले से अब पुलिस के लिए यह अनिवार्य हो गया है कि वह एफआईआर दर्ज करने से पहले यह जांचे कि क्या मामला वास्तव में अपराध की श्रेणी में आता है या केवल एक स्वतंत्र विचार की अभिव्यक्ति है।
