
भोपाल। सरकारी पेंशन खातों में बड़े घोटाले का मामला सामने आया है. ईओडब्ल्यू ने मामले में बैंक कर्मचारियों और उनके परिचितों पर एफआईआर दर्ज की है. आरोप है कि एटीएम कार्ड और फाइनेंस सिस्टम का दुरुपयोग कर ₹44 लाख का गबन किया गया है. ईओडब्ल्यू ने इस मामले में 7 आरोपियों को नामज़द किया है.
आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) से मिली जानकारी के अनुसार बैंक ऑफ इंडिया भोपाल की शिकायत पर मामले की जाँच के बाद बैंक के दो कर्मचारियों और पाँच सह-आरोपियों के खिलाफ एक्शन लिया गया. बैंक कर्मचारी दीपक जैन (विशेष सहायक) तथा अजय सिंह परिहार (स्टाफ क्लर्क) ने अपनी पदस्थापना का दुरुपयोग करते हुए बड़ी राशि का गबन किया है. ईओडब्ल्यू की जांच में पाया गया कि दोनों कर्मचारियों ने बैंक नियमों के विपरीत, जहाँ एक कर्मचारी एंट्री करता है और दूसरा वेरिफाई करता है. दोनों ने अपनी खुद की आईड़ी का उपयोग कर एक-दूसरे के लेनदेन को सत्यापित किया. खाते सक्रिय होते ही उनकी जमा राशि को चार अन्य परिचित खाताधारकों खुशबू खान, कल्पना जैन, ललिता ठाकुर और अफरोज खान के खातों में ट्रांसफर किया गया. इन सभी के एटीएम कार्ड आरोपी दीपक जैन के पास थे, जिसके माध्यम से नियमित रूप से नगद निकासी की जाती रही. आरोपियों के बीच अवैध रूप से प्राप्त धनराशि का बँटवारा 70:30 के अनुपात में किया जाता था. यह धोखाधड़ी लगभग तीन वर्षों (जनवरी 2016 से मार्च 2019) तक विभिन्न शाखाओं में चलती रही और कुल 227 बचत खातों से लगभग ₹44.11 लाख की राशि अवैध रूप से डेबिट की गई. जांच के दौरान फिनैकल लॉग, ट्रांजैक्शन रिपोर्ट, सीसीटीवी फुटेज, एटीएम निकासी विवरण, ऑडिट ट्रेल एवं विभिन्न शाखाओं के रिकॉर्ड के विश्लेषण से आरोपियों की भूमिका पूरी तरह से सिद्ध हुई. खाताधारकों की तरफ से की गई एक संगठित बैंक धोखाधड़ी का पर्दाफाश ईओडब्ल्यू ने किया है.
मामले का खुलासा तब हुआ जब 18 मार्च 2019 को सैफिया कॉलेज शाखा में एक महिला भगवती देवी ने अपने मृत पति के खाते से अवैध निकासी की शिकायत दर्ज कराई. शाखा प्रबंधक ने आंतरिक जाँच में पाया कि संदिग्ध लेनदेन अजय सिंह परिहार और दीपक जैन की तरफ से किया गया है. इसके बाद मामला उच्च अधिकारियों तक पहुँचा, जहाँ बैंक की विजिलेंस यूनिट एवं विभागीय जाँच में बड़े पैमाने पर की गई अनियमितताएँ उजागर हुईं.
जानकारी के अनुसार इसके साथ ही आरोपियों ने बैंक की तरफ से उपलब्ध कराए गए दस्तावेज़, ट्रांजैक्शन विवरण, विजिलेंस रिपोर्ट, विभागीय कार्रवाई और प्रारंभिक जांच में यह भी पाया कि यह धोखाधड़ी तीन वर्षों से अधिक समय तक कई शाखाओं में लगातार चलती रही. बैंक की इस गंभीर शिकायत और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ, ने जांच प्रारंभ की, जिसमें यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि आरोपियों ने योजनाबद्ध तरीके से बैंकिंग प्रणाली का दुरुपयोग कर सरकारी राशि का गबन किया गया है. शिकायत जांच में आरोप प्रथम दृष्टया सत्य पाए जाने पर इस प्रकरण में विधिसम्मत रूप से अपराध पंजीबद्ध किया गया है.
