नयी दिल्ली, 23 जनवरी (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय को अनिल धीरूभाई अंबानी समूह और उसके प्रमोटर अनिल अंबानी की कंपनियों से जुड़े कथित बैंक धोखाधड़ी मामले में चल रही जांच पर सीलबंद लिफाफे में स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने पूर्व केंद्रीय सचिव ईएएस शर्मा द्वारा दायर एक जनहित याचिका की शुक्रवार को सुनवाई करने के बाद यह निर्देश दिया। याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि समूह की कंपनियों पर बकाया 15 लाख करोड़ रुपये से अधिक के ऋण को कथित रूप से माफ कर दिया गया और कई फर्जी संस्थाओं के माध्यम से राशि का गबन किया गया। उन्होंने इसे “देश में सबसे बड़ा बैंक ऋण घोटाला” करार दिया।
श्री भूषण ने बताया कि पिछले साल 18 नवंबर को नोटिस जारी किए जाने के बावजूद अंबानी समूह की संस्थाओं और अनिल अंबानी ने अदालत में पेशी नहीं की। उन्होंने कहा कि इस मामले की व्यापक रूप से रिपोर्टिंग हुई है और ऐसा नहीं है कि वे कार्यवाही से अनजान हैं। पेश नहीं होने पर ध्यान केंद्रित करते हुए पीठ ने पाया कि नोटिस तामील किए जाने के बावजूद प्रतिवादी उपस्थित नहीं हुए। न्याय के हित में, न्यायालय ने उन्हें अंतिम अवसर प्रदान करते हुए नया नोटिस जारी किया और बॉम्बे उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को नोटिस तामील कराने का निर्देश दिया। श्री भूषण ने सीबीआई और ईडी से स्थिति रिपोर्ट के लिए निर्देश की भी मांग की और तर्क दिया कि बैंक अधिकारियों की मिलीभगत का संकेत देने वाले व्यापक साक्ष्यों के बावजूद किसी भी लोक सेवक को आरोपी के रूप में नामित नहीं किया गया है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वे दलीलों का विरोध नहीं कर रहे हैं और न्यायालय को सूचित किया कि भारतीय स्टेट बैंक द्वारा किए गए फोरेंसिक ऑडिट के आधार पर एफआईआर दर्ज की गई थी। उन्होंने आगे कहा कि ऑडिट में स्वीकृत उद्देश्यों के अलावा अन्य उद्देश्यों के लिए धन की हेराफेरी का खुलासा हुआ, जिसके आधार पर एसबीआई ने सीबीआई से संपर्क किया।
याचिका के अनुसार, रिलायंस कम्युनिकेशंस और उसकी समूह की कंपनियों ने 2013 और 2017 के बीच एसबीआई के नेतृत्व वाले एक कंसोर्टियम से 31,580 करोड़ रुपये का ऋण प्राप्त किया। अक्टूबर 2020 में प्रस्तुत एक फोरेंसिक ऑडिट में कथित रूप से संबंधित पक्षों, शेल फर्मों, सर्कुलर लेनदेन और फर्जी संपत्ति खरीद के माध्यम से बड़ी रकम के गबन का खुलासा हुआ। हालांकि, एसबीआई ने औपचारिक शिकायत अगस्त 2025 में, लगभग पांच साल बाद दर्ज की गई और याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस देरी के कारण बैंक अधिकारियों की भूमिका की गहन जांच होनी चाहिए। इसके बाद सीबीआई ने साजिश, धोखाधड़ी एवं आपराधिक विश्वासघात का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज की, जिसमें कथित रूप से 2,929 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
याचिका में तर्क दिया गया है कि एफआईआर में कथित कदाचार का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही शामिल है और इसमें ऋणों की एवरग्रीनिंग, फर्जी प्रविष्टियां और नेटिज़न इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड और कुंज बिहारी डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड सहित अज्ञात संस्थाओं के माध्यम से धन का गबन जैसे गंभीर अपराधों को शामिल नहीं किया गया है। याचिका में कई फोरेंसिक ऑडिट और जांच रिपोर्टों का भी हवाला दिया गया है, जिनमें कोबरापोस्ट की एक जांच भी शामिल है जिसमें समूह की कंपनियों में लगभग 41,921 करोड़ रुपये के गबन का आरोप लगाया गया है और रिलायंस कैपिटल का 2022 का ऑडिट जिसमें लगभग 16,000 करोड़ रुपये की अंतर-कॉर्पोरेट जमा राशि और बार-बार नीतिगत उल्लंघनों को उजागर किया गया है।
दिवालियापन की कार्यवाही के दौरान तैयार की गई ग्रांट थॉर्नटन की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए यह आरोप लगाया गया है कि लेनदारों के लिए हानिकारक अधिमान्य और कम मूल्य वाले लेनदेन किए गए थे। याचिकाकर्ता ने इस बात पर बल देते हुए कि ऋण स्वीकृत करने और उसकी निगरानी करने में शामिल बैंक अधिकारी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत लोक सेवक हैं, यह तर्क दिया कि उन्हें जांच से बाहर रखने से जांच अधूरा रहता है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करता है।
सार्वजनिक धन की शामिल राशि एवं कथित संस्थागत आयामों को देखते हुए याचिका में जांच की न्यायिक निगरानी एवं शीर्ष अदालत की देखरेख में एक विशेषज्ञ समिति के गठन की मांग की गई है, जो ऐसी वित्तीय घोटालों की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए प्रणालीगत सुधारों की सिफारिश करता है।
