स्लाटर हाउस मामला: नियमों की अनदेखी से लेकर गौशालाओं तक सवालों के घेरे में नगर निगम और पुलिस

भोपाल। राजधानी के स्लाटर हाउस से जुड़ा मामला अब केवल अवैध गतिविधियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह नगर निगम, एमआईसी, महापौर परिषद और पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है। जमीन की लीज से लेकर टेंडर प्रक्रिया तक नियमों की खुलेआम अनदेखी किए जाने के आरोप सामने आए हैं। हैरानी की बात यह है कि जिम्मेदारी तय करने के बजाय कार्रवाई का दायरा निचले स्तर के कर्मचारियों तक ही सीमित रखा गया, जबकि नीति निर्धारण से जुड़े अधिकारी और जनप्रतिनिधि संदेह के घेरे में हैं।

सूत्रों के अनुसार स्लाटर हाउस के संचालन में लीज गाइडलाइन का पालन नहीं किया गया। टेंडर राशि पर हर वर्ष निर्धारित वृद्धि लागू करने के बजाय लीज राशि बढ़ाने का आदेश जारी कर दिया गया, जबकि टेंडर को एमआईसी के बाद परिषद में लाना भी जरूरी था। इस पूरी प्रक्रिया को नजरअंदाज करना नगर निगम की मंशा पर सवाल खड़े करता है।

गौशालाओं तक नहीं पहुंची जांच

स्लाटर हाउस में गायों की मौजूदगी का मामला उजागर होने के बाद भी नगर निगम ने शहर की गौशालाओं और कांजी हाउसों की कोई समग्र जांच शुरू नहीं की। यदि स्लाटर हाउस में गायों की हत्या हुई, तो वे वहां तक पहुंचीं कैसे और कहां से आईं—यह अब तक अनुत्तरित है। चूंकि भोपाल की सभी गौशालाएं और कांजी हाउस नगर निगम की देखरेख में संचालित होते हैं, ऐसे में चार वर्षों के रिकॉर्ड की जांच न होना निगम और पुलिस दोनों की भूमिका को संदिग्ध बनाता है।

टैक्स बढ़ाने की जगह लीज में बदलाव

नेता प्रतिपक्ष शबिस्ता जकी ने आरोप लगाया कि नगर निगम ने स्लाटर हाउस के प्रति नरम रुख अपनाया। नियमों के अनुसार टेंडर राशि पर हर साल 5 प्रतिशत टैक्स बढ़ाया जाना था, लेकिन इसे लागू करने के बजाय लीज राशि बढ़ाने का निर्णय लिया गया। इससे न केवल राजस्व व्यवस्था प्रभावित हुई, बल्कि प्रक्रिया की पारदर्शिता भी सवालों में आ गई।

कंटेनर छोड़े जाने पर भी सवाल

हिंदू संगठनों द्वारा मांस से भरे कंटेनर को पकड़कर पुलिस निगरानी में पशु चिकित्सालय पहुंचाया गया। वहां मांस के नमूने लेने के बाद कंटेनर को छोड़ दिया गया, जबकि जांच रिपोर्ट आने तक उसे जब्त कर पुलिस निगरानी में रखा जाना चाहिए था। यदि नमूनों में गौमांस की पुष्टि होती, तो पूरे मामले को न्यायालय में प्रस्तुत किया जाना आवश्यक था। विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे खाद्य पदार्थों के मामलों में रिपोर्ट आने तक सामग्री सुरक्षित रखी जाती है, वैसी ही प्रक्रिया यहां भी अपनाई जानी चाहिए थी।

कुल मिलाकर स्लाटर हाउस प्रकरण अब प्रशासनिक लापरवाही, नियमों की अनदेखी और जिम्मेदारी से बचने की प्रवृत्ति का प्रतीक बनता जा रहा है, जिसमें नगर निगम और पुलिस दोनों की भूमिका पर जवाबदेही तय होना बाकी है।

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