
सुप्रीम कोर्ट ने चर्चित ‘कैश कांड’ मामले में आरोपी जस्टिस यशवंत वर्मा की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति की वैधता को चुनौती दी थी। जस्टिस वर्मा का तर्क था कि जांच समिति के गठन में ‘जजेस इंकवायरी एक्ट, 1968’ की प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि चूंकि लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति दोनों ने प्रस्ताव पारित नहीं किया था, इसलिए संयुक्त समिति का गठन संभव नहीं था। कोर्ट ने माना कि प्रक्रियात्मक आपत्तियां इतनी गंभीर नहीं हैं कि संवैधानिक समिति के कामकाज में हस्तक्षेप किया जाए।
जस्टिस वर्मा ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि लोकसभा अध्यक्ष ने राज्यसभा सभापति से परामर्श किए बिना ही समिति बना दी, जो नियमों के विरुद्ध है। इससे पहले संसदीय समिति के समक्ष अपना जवाब दाखिल करते हुए जस्टिस वर्मा ने खुद को निर्दोष बताया था। उन्होंने सवाल उठाया था कि यदि सरकारी अधिकारी और पुलिस ‘क्राइम सीन’ को सुरक्षित रखने में विफल रहे, तो इसके लिए उन्हें जिम्मेदार मानकर महाभियोग की प्रक्रिया क्यों शुरू की जानी चाहिए? उन्होंने तर्क दिया कि वे घटनास्थल पर पहुँचने वाले एकमात्र व्यक्ति नहीं थे, इसलिए साक्ष्यों से छेड़छाड़ का आरोप उन पर मढ़ना गलत है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद जस्टिस यशवंत वर्मा के पास कानूनी विकल्प सीमित हो गए हैं। अदालत ने उन्हें पहले ही निर्देश दिया था कि वे 12 जनवरी को समिति के समक्ष उपस्थित हों। अब याचिका खारिज होने के बाद उन्हें लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित समिति की जांच का सामना करना ही होगा। यह मामला न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्ति संतुलन और जजों की जवाबदेही के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आने वाले दिनों में समिति की रिपोर्ट यह तय करेगी कि क्या जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही सदन में आगे बढ़ेगी।
