डिजिटल युग ने जहां नागरिकों को अभूतपूर्व सुविधाएं दी हैं, वहीं साइबर अपराधों के नए-नए रूप भी सामने आए हैं. इन्हीं में से एक है तथाकथित ‘डिजिटल अरेस्ट’, जो कानूनन अस्तित्वहीन होने के बावजूद भय, भ्रम और तकनीकी अज्ञानता के सहारे लोगों को ठगने का बड़ा माध्यम बन चुका है. वीडियो कॉल पर वर्दीधारी चेहरों का डर, फर्जी नोटिस और तुरंत पैसे ट्रांसफर करने का दबाव,यह सब एक संगठित साइबर अपराध तंत्र का हिस्सा है. इस गंभीर चुनौती को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक बहु-आयामी रणनीति के जरिए इस पर लगाम लगाने का प्रयास तेज कर दिया है.
सरकार की इस रणनीति की रीढ़ है अंतर-विभागीय समिति (आईडीसी), जिसका गठन दिसंबर 2025 में किया गया. गृह मंत्रालय, दूरसंचार विभाग, आरबीआई और खुफिया एजेंसियों को एक मंच पर लाकर यह समिति ‘रियल-टाइम’ समाधान पर काम कर रही है. पहली बार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और सर्च इंजनों को सीधे जिम्मेदार भागीदार बनाया गया है, ताकि व्हाट्सएप, स्काइपे जैसे माध्यमों पर सक्रिय संदिग्ध खातों को बिना देरी ब्लॉक किया जा सके. यह कदम इस बात का संकेत है कि सरकार अब साइबर अपराध को केवल पुलिसिंग का नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी गवर्नेंस का मुद्दा मान रही है.
दूसरी बड़ी पहल है सीबीआई को दी गई खुली छूट. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद डिजिटल अरेस्ट जैसे स्कैम की जांच में अब आधे-अधूरे हाथ नहीं, बल्कि पूरा अधिकार दिया गया है. खास बात यह है कि जांच का दायरा केवल ठगों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन बैंक कर्मचारियों तक भी पहुंच रहा है जो ‘म्यूल अकाउंट’ खोलने में भूमिका निभाते हैं. यह संदेश स्पष्ट है,सिस्टम के भीतर मौजूद कमजोर कड़ी अब जांच से बाहर नहीं रहेगी. वहीं इंटरपोल के साथ सहयोग बढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को तोडऩे की कोशिश इस अपराध की वैश्विक प्रकृति को स्वीकार करने का प्रमाण है.
तकनीकी मोर्चे पर आई बार सी और डीओटी की भूमिका निर्णायक बनकर उभरी है. स्पूफ कॉल्स,जो विदेश से होकर भी भारतीय नंबर दिखाती हैं,अब पहले जैसी सहजता से लोगों तक नहीं पहुंच पा रही हैं. लाखों सिम कार्ड, आईएमईआई नंबर और हजारों डिजिटल अकाउंट का ब्लॉक होना बताता है कि कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित नहीं है. इसके साथ ही इसे सरकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से भी जोड़ा गया है. संदिग्ध यूपीआई या नंबर को पहले ही जांच सकना साइबर सुरक्षा में जन-भागीदारी का महत्वपूर्ण कदम है.
इस पूरी कवायद को मजबूती देता है 782 करोड़ रुपए का बजटीय प्रावधान और राज्यों में क्षेत्रीय साइबर अपराध केंद्रों को सशक्त करने की योजना. यह स्वीकारोक्ति है कि साइबर अपराध का मुकाबला केवल केंद्र से नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर मजबूत ढांचे से ही संभव है.
सबसे अहम संदेश, जिसे बार-बार दोहराने की जरूरत है,भारत के किसी भी कानून में ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसा कोई प्रावधान नहीं है. न पुलिस वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी करती है, न ही कोई सरकारी एजेंसी पैसे मांगती है. सरकार द्वारा गूगल, एआई और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से संवाद इस दिशा में सही कदम है, लेकिन अंतिम सुरक्षा कवच जागरूक नागरिक ही है.डिजिटल अरेस्ट के खिलाफ यह लड़ाई केवल तकनीक या कानून की नहीं, बल्कि भरोसे और जानकारी की है. सरकार की बहु-स्तरीय रणनीति उम्मीद जगाती है, पर इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि डर के इस डिजिटल जाल को हम कितनी समझदारी से पहचान पाते हैं.
