मौत का कारखाना और व्यवस्था की मिलीभगत

देवास के टोककलां में पटाखा फैक्टरी विस्फोट कांड के बाद प्रदेश भर के जिला प्रशासन में हडक़ंप है. लगातार सघन जांचें हो रही हैं और पटाखों की फैक्ट्रियां सील की जा रही हैं. यदि प्रशासन फरवरी 2024 में हुए हरदा विस्फोट कांड के बाद यही सतर्कता बरतता तो शायद देवास जिले में इतना बड़ा कांड होता ही नहीं ! दरअसल, यह कांड हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, भ्रष्ट तंत्र और मानव जीवन के प्रति संवेदनहीनता का भयावह उदाहरण है. पांच मजदूरों की मौत और 25 लोगों के घायल होने की घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि देश के कई हिस्सों में गरीब मजदूरों की जिंदगी आज भी सस्ते बारूद से ज्यादा कीमत नहीं रखती. सवाल यह है कि आखिर यह मौत का कारखाना इतने लंबे समय तक किसके संरक्षण में चल रहा था ?

जिस फैक्टरी में पहले भी आग लग चुकी हो, जिसके खिलाफ ग्राम पंचायत ने लिखित शिकायत दी हो, जहां से महज 500 मीटर की दूरी पर आबादी और 700 मीटर पर पेट्रोल पंप हो, वहां विस्फोटक सामग्री बनाने की अनुमति कैसे दी गई ? यह केवल तकनीकी चूक नहीं, बल्कि संगठित प्रशासनिक अपराध है. यदि सरपंच की चेतावनी के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो स्पष्ट है कि कहीं न कहीं अधिकारियों ने आंखें मूंद रखी थीं या फिर उन्हें सब कुछ जानते हुए भी अनदेखा करने में फायदा नजर आ रहा था.

सबसे भयावह तथ्य यह है कि फैक्टरी पांच महीने तक कथित रूप से बिना वैध लाइसेंस के चलती रही. आखिर पुलिस, राजस्व विभाग, श्रम विभाग, उद्योग विभाग और विस्फोटक नियंत्रण विभाग क्या कर रहे थे ? क्या इतनी बड़ी फैक्टरी रातों-रात खड़ी हो गई थी? क्या प्रशासन को वहां मजदूरों की आवाजाही, केमिकल के ड्रम और पटाखा निर्माण की जानकारी नहीं थी ? यदि जानकारी नहीं थी तो यह अक्षम व्यवस्था है, और यदि जानकारी थी तो यह सीधी मिलीभगत है.

घटना के बाद रासुका लगाना और गिरफ्तारियां करना पर्याप्त नहीं है. यह कार्रवाई तब क्यों नहीं हुई जब 14 मार्च को फैक्टरी में आग लगी थी? तब यदि प्रशासन सख्ती दिखाता, तो शायद पांच परिवार उजडऩे से बच जाते. यह भी गंभीर चिंता का विषय है कि फैक्टरी में किशोर मजदूर तक काम कर रहे थे. पानी में खड़े होकर विस्फोटक तैयार करवाना किसी औद्योगिक गतिविधि नहीं, बल्कि मजदूरों को मौत के मुंह में धकेलना है.

मध्यप्रदेश सरकार ने मृतकों के परिवारों को चार-चार लाख रुपए की सहायता देने की घोषणा की है, लेकिन क्या इंसानी जिंदगी की कीमत इतनी भर है ? जरूरत इस बात की है कि इस मामले में केवल फैक्टरी मालिक और ठेकेदार ही नहीं, बल्कि संबंधित विभागों के उन अधिकारियों पर भी हत्या का मामला दर्ज हो, जिन्होंने नियमों की अनदेखी की. मजिस्ट्रियल जांच अक्सर सरकारी फाइलों में दफन होकर रह जाती है. इस बार न्याय तभी माना जाएगा जब जिम्मेदार अफसरों की जवाबदेही तय हो और उन्हें सेवा से बर्खास्त कर जेल भेजा जाए.

देशभर में अवैध पटाखा फैक्ट्रियां और विस्फोटक इकाइयां गरीब मजदूरों की कब्रगाह बन चुकी हैं. हर हादसे के बाद मुआवजा, जांच और गिरफ्तारी की औपचारिकता होती है, फिर कुछ महीनों बाद सब सामान्य हो जाता है. यह चक्र अब टूटना चाहिए. सरकार को राज्यव्यापी अभियान चलाकर सभी विस्फोटक इकाइयों की जांच करनी चाहिए और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर गैर इरादतन हत्या नहीं, बल्कि हत्या जैसी कठोर धाराओं में कार्रवाई करनी चाहिए.

देवास की यह त्रासदी केवल पांच मजदूरों की मौत नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का विस्फोट है जिसमें मुनाफा इंसानियत पर भारी पड़ रहा है.

 

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