मौत का मांजा: सख्ती के साथ जागरूकता अनिवार्य

मकर संक्रांति जैसे लोकपर्व का उल्लास जब मौत की डोर में उलझ जाए, तो यह केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि पूरे समाज और प्रशासन के लिए चेतावनी होती है. चाइनीज नायलॉन मांजे से लगातार हो रही मौतों और गंभीर हादसों के बाद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा स्वत: संज्ञान लेना बताता है कि मामला अब सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक जिम्मेदारी का है. अदालत के सख्त निर्देश इस बात का संकेत हैं कि अब किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी.हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि चाइनीज मांजा बेचने या इस्तेमाल करने वालों पर भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 106(1) के तहत आपराधिक प्रकरण दर्ज होगा, जिसमें पांच साल तक की सजा का प्रावधान है. इतना ही नहीं, यदि कोई नाबालिग इस जानलेवा मांजे से पतंग उड़ाते हुए पाया गया, तो उसके माता-पिता और अभिभावकों को भी जिम्मेदार ठहराया जाएगा. यह फैसला उन अभिभावकों के लिए कड़ा संदेश है जो ‘बच्चे हैं, समझ नहीं है’ कहकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करते हैं.

दरअसल, चाइनीज मांजा सिर्फ एक अवैध उत्पाद नहीं, बल्कि यह मूक हत्यारा बन चुका है. बाइक सवारों की गर्दन कटने की घटनाएं, पक्षियों की निर्मम मौत और पर्यावरण को होने वाला नुकसान इसे साधारण अपराध से कहीं आगे ले जाता है. इसी गंभीरता को देखते हुए अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की धाराओं के तहत भी कार्रवाई का रास्ता खुला है. यानी यह अपराध अब मानव जीवन के साथ-साथ पर्यावरण के खिलाफ भी माना जाएगा.

हाईकोर्ट ने इंदौर सहित उज्जैन, देवास, धार, झाबुआ, रतलाम, शाजापुर, आलीराजपुर, नीमच, मंदसौर, बड़वानी, खरगोन और राजगढ़ जैसे जिलों के कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों को कड़ाई से प्रतिबंध लागू कराने के निर्देश दिए हैं. बाजारों पर निगरानी बढ़ाने, गोदामों और दुकानों पर छापे मारने और कालाबाजारी करने वालों को जिलाबदर करने जैसे कदम प्रशासन की सख्ती को दर्शाते हैं. अब तक 54 गिरफ्तारियां यह बताती हैं कि कार्रवाई शुरू हो चुकी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पर्याप्त है. बहरहाल,कानून का डर जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है समाज की भागीदारी. जब तक आम नागरिक, व्यापारी और अभिभावक खुद यह नहीं समझेंगे कि सस्ता मुनाफा या क्षणिक मनोरंजन किसी की जान से बड़ा नहीं हो सकता, तब तक ऐसी घटनाएं रुकेंगी नहीं. प्रशासन द्वारा प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के माध्यम से जन जागरूकता अभियान चलाने का निर्देश इसी दिशा में अहम कदम है.

मकर संक्रांति उल्लास, भाईचारे और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व है, न कि शोक और मातम का कारण. पतंग उड़ाना परंपरा है, लेकिन परंपरा के नाम पर अपराध को संरक्षण नहीं दिया जा सकता. हाईकोर्ट की सख्ती ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब ‘अनजाने में हो गया’ या ‘बच्चे ने किया’ जैसे बहाने काम नहीं आएंगे. समय की मांग है कि कानून, प्रशासन और समाज,तीनों मिलकर यह सुनिश्चित करें कि ‘आसमान में उड़ती हर पतंग खुशी, सुरक्षा और जिम्मेदारी का प्रतीक बने,मौत की डोर नहीं, तभी मकर संक्रांति जैसे पर्व सच मायनों में उत्सव कहलाएंगे. ‘

 

 

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