पंच परिवर्तन का आह्वान: हिंदू पहचान, स्वभाव और समरसता ही राष्ट्र की शक्ति-भागवत

भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने भोपाल में आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी में कहा कि मत, पंथ, भाषा और जाति भले अलग हों, लेकिन हिंदू पहचान हम सबको जोड़ती है। उन्होंने हिंदू समाज को स्वभाव और प्रकृति से जोड़ते हुए धर्म की व्यापक व्याख्या की, संघ की कार्यपद्धति पर चल रहे भ्रमों को स्पष्ट किया और समाज व राष्ट्र की उन्नति के लिए पंच परिवर्तन का आह्वान किया।

भागवत ने कहा कि हिंदू केवल एक धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि स्वभाव और प्रकृति है, जो समाज को जोड़ने और आगे बढ़ाने का कार्य करती है। भोपाल में आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जब-जब हम अपनी हिंदू पहचान भूलते हैं, तब-तब विपत्ति आती है। इतिहास इसका साक्षी है। इसलिए हिंदू समाज को जागृत और संगठित करना आवश्यक है।

डॉ. भागवत ने हिंदू समाज के चार वर्गों का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ गर्व से स्वयं को हिंदू कहते हैं, कुछ सहज भाव से, कुछ संकोच में और कुछ ऐसे भी हैं जो अपनी पहचान भूल चुके हैं। उन्होंने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि धर्म केवल पूजा-पद्धति या रिलीजन नहीं है, बल्कि कर्तव्य, संयम, सद्भावना और सबको साथ लेकर चलने की भावना ही धर्म है। रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन लक्ष्य एक ही है।

संघ को लेकर चल रहे विभिन्न नैरेटिव पर बोलते हुए सरसंघचालक ने कहा कि संघ दुनिया का अनूठा संगठन है, जिसकी तुलना किसी अन्य संस्था से नहीं की जा सकती। संघ न तो पैरा मिलिट्री फोर्स है और न ही केवल समाजसेवी संगठन। संघ को सही रूप में समझने की आवश्यकता है, इसलिए शताब्दी वर्ष में समाज के सामने उसकी वास्तविकता रखने का विचार किया गया है।

उन्होंने कहा कि संघ किसी की प्रतिक्रिया या प्रतिस्पर्धा में नहीं बना। इसके संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने स्वतंत्रता आंदोलन सहित समाजहित के अनेक कार्यों में भाग लिया और गहन चिंतन के बाद समाज में एकता और गुणवत्ता स्थापित करने के उद्देश्य से संघ की स्थापना की। संघ ने कभी प्रेशर ग्रुप बनने के बजाय पूरे हिंदू समाज को संगठित करने का मार्ग चुना।

डॉ. भागवत ने कहा कि संघ केवल स्वयंसेवक निर्माण करता है और स्वयंसेवक समाज की आवश्यकता के अनुसार कार्य करते हैं। संघ किसी को रिमोट कंट्रोल से संचालित नहीं करता। उन्होंने बताया कि उपेक्षा और तीव्र विरोध के बावजूद संघ कार्यकर्ता भारत माता के प्रति आस्था रखते हुए आगे बढ़ते रहे और आज समाज का विश्वास संघ पर बढ़ा है, हालांकि संपूर्ण समाज का संगठन करना अभी शेष है।

समाज में मौजूद सज्जन शक्तियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि केवल संघ ही नहीं, बल्कि सभी मत-संप्रदायों में भलाई का कार्य करने वाली शक्तियां हैं। इन्हें आपस में जोड़कर सकारात्मक वातावरण बनाना आवश्यक है। अंत में सरसंघचालक ने सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वबोध और नागरिक अनुशासन से जुड़े पंच परिवर्तन को अपनाने का आह्वान किया।

Next Post

ममता बनर्जी मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलेंगी-अभिषेक बनर्जी

Fri Jan 2 , 2026
कोलकाता, 02 जनवरी (वार्ता) पश्चिम बंगाल में सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने शुक्रवार को कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राज्य में चल रही चुनावी प्रक्रिया के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर अपनी आपत्तियां औपचारिक रूप से दर्ज कराने के लिए नई दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त […]

You May Like