नई दिल्ली | 02 जनवरी, 2026: भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय तनाव अपने चरम पर होने के बावजूद, दोनों देशों ने गुरुवार को अपने-अपने परमाणु प्रतिष्ठानों और संस्थानों की सूची का आदान-प्रदान किया। विदेश मंत्रालय द्वारा जारी जानकारी के अनुसार, यह प्रक्रिया ‘परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमलों के निषेध’ संबंधी समझौते के तहत पूरी की गई। गौरतलब है कि पिछले वर्ष मई में दोनों देशों के बीच चार दिनों का भीषण युद्ध हुआ था, जो जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले और भारत के जवाबी ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद भड़का था। युद्ध और भारी मनमुटाव के बीच इस कूटनीतिक जानकारी का साझा होना दक्षिण एशिया की सुरक्षा दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यह ऐतिहासिक समझौता 31 दिसंबर 1988 को हस्ताक्षरित हुआ था और 27 जनवरी 1991 से पूर्णतः प्रभावी हुआ। इसके प्रावधानों के अनुसार, भारत और पाकिस्तान प्रत्येक कैलेंडर वर्ष की 1 जनवरी को अनिवार्य रूप से उन परमाणु ठिकानों की सूची साझा करते हैं जिन्हें हमले से सुरक्षित रखा जाना है। 1 जनवरी 1992 से शुरू हुई यह परंपरा इस वर्ष 35वीं बार निभाई गई है। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य युद्ध या संकट की स्थिति में एक-दूसरे के परमाणु ऊर्जा संयंत्रों, अनुसंधान रिएक्टरों और यूरेनियम संवर्धन सुविधाओं पर जानबूझकर या आकस्मिक सैन्य कार्रवाई को रोकना है, ताकि किसी भी बड़े परमाणु हादसे से बचा जा सके।
दो परमाणु-सशस्त्र पड़ोसियों के बीच यह आदान-प्रदान विश्वास-निर्माण (CBM) का एक अहम हिस्सा है। भले ही सीमा पर संघर्ष और सीजफायर की स्थिति बनी रहती है, लेकिन यह सूची साझा करना सुनिश्चित करता है कि रेडियोधर्मी सामग्री वाले संवेदनशील क्षेत्रों को सैन्य लक्ष्यों से बाहर रखा जाए। यह प्रतिबद्धता न केवल रणनीतिक सुरक्षा के लिए बल्कि पर्यावरण और करोड़ों मानव जीवन की सुरक्षा के लिए भी अनिवार्य है। विशेषज्ञों का मानना है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और हालिया युद्ध के बाद उपजे अविश्वास के माहौल में, इस संधि का पालन होना यह दर्शाता है कि दोनों पक्ष परमाणु जोखिमों को लेकर अभी भी जिम्मेदारी साझा करते हैं।

