इंदौर, जिसे हम बार-बार ‘देश का सबसे स्वच्छ शहर’ कहकर गर्व महसूस करते हैं,आज उसी शहर के भागीरथपुरा क्षेत्र से जो करुण चीखें उठी हैं, वे केवल एक स्थानीय त्रासदी की नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की क्रूर संवेदनहीनता की गवाही देती हैं. दूषित पानी पीने से 12 लोगों की मौत और अनेकों नागरिकों का अस्पताल में भर्ती होना किसी प्राकृतिक आपदा का नतीजा नहीं, बल्कि यह नगर निगम और जल प्रदाय तंत्र की आपराधिक लापरवाही से उपजा एक प्रशासनिक अपराध है.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब लोगों ने कई दिनों से गंदे, दुर्गंधयुक्त और संदिग्ध पानी की शिकायतें की थीं,तो यह शिकायतें आखिर किस फाइल में दफन कर दी गईं ? किसके आदेश पर इन्हें अनसुना किया गया ? और किस ‘सिस्टम’ ने नागरिकों की चीखों को महज़ नोटिंग-शीट में बदलकर रख दिया ?
26 दिसंबर को पहली मौत हुई. इसके बाद भी न जगने वाला प्रशासन क्या जीवन की कीमत से पूरी तरह बेपरवाह हो चुका है ? पाइपलाइन में रिसता सीवर का जहर जनता के गिलासों तक पहुंचता रहा और जिम्मेदार अधिकारी ‘सब नियंत्रण में है’ का रटंत पाठ पढ़ते रहे. यह केवल लापरवाही नहीं,यह जिम्मेदारी से भागा हुआ प्रशासन है. और अगर चेतावनी के बावजूद कार्रवाई न हो, तो क्या इसे गैर-इरादतन हत्या का मामला नहीं माना जाना चाहिए ? इंदौर की स्वच्छता रैंकिंग पर टंगे चमकदार बोर्ड, सडक़ों पर रंगे-सजे डिब्बे और पुरस्कार ग्रहण करती नगर व्यवस्था,इन सबके पीछे अब जो कुरूप सच दिख रहा है, वह यह कि शहर जर्जर पानी लाईनों के भरोसे जिंदा है. भागीरथपुरा की गलियों में बहता ड्रेनेज, घरों में पहुंचता जहरीला पानी और अस्पतालों में बिस्तरों पर तड़पते नागरिक,यह दृश्य बताता है कि ‘नंबर-1 इंदौर’ के दावे उस समय खोखले पड़ जाते हैं, जब नागरिकों को दो घूंट सुरक्षित पानी भी न मिल पाए.
इस पूरे प्रकरण में सबसे खतरनाक तत्व है, जवाबदेही का अभाव. हर त्रासदी के बाद ‘जांच समिति’ बना देना, ‘रिपोर्ट का इंतजार’ कह देना और दो-चार अधिकारियों का औपचारिक निलंबन,यह प्रशासनिक पाखंड अब जनता को स्वीकार नहीं. इंदौर को जांच रिपोर्ट नहीं, दृढ़ और उदाहरणात्मक दंडात्मक कार्रवाई चाहिए.
इसलिए मांगें स्पष्ट हैं और इन्हें टाला नहीं जाना चाहिए.
पहला,जिन अधिकारियों के अधीन यह क्षेत्र था, जिनकी मेज पर शिकायतें पहुंचीं और फिर भी कार्रवाई नहीं हुई,उन पर गैर-इरादतन हत्या की धाराओं में एफआईआर दर्ज हो. दूसरा,सिर्फ निलंबन नहीं, सीधी बर्खास्तगी हो,ताकि यह संदेश जाए कि प्रशासनिक कुर्सी जनता के जीवन से बड़ी नहीं.
तीसरा,नगर निगम के शीर्ष स्तर पर जवाबदेही तय हो, और यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाए कि पहली चेतावनी पर कार्रवाई क्यों रोकी गई. यह घटना केवल एक क्षेत्रीय विफलता नहीं,यह उस प्रणाली का प्रतिफल है जिसमें रैंकिंग और सर्टिफिकेट को नागरिकों के जीवन से ऊपर रख दिया गया है. अगर आज समाज चुप रहा, तो कल किसी अन्य बस्ती में फिर एक ‘भागीरथपुरा’ जन्म लेगा. इंदौर को यह तय करना होगा कि क्या हम चमकदार पुरस्कारों के भ्रम में जीते रहेंगे, या उस वास्तविक शहर के लिए आवाज उठाएंगे जहां पानी जीवन देता है,मौत नहीं ! अब वक्त शोक का नहीं, निर्दयी सिस्टम से जवाब मांगने का है.
