बांग्लादेश : भारत को चौकस रहने की जरूरत

पड़ोसी बांग्लादेश में बीते कुछ समय से जिस तरह की हिंसा, अराजकता और लक्षित दंगों की घटनाएं सामने आ रही हैं, वह केवल ढाका की आंतरिक समस्या भर नहीं रह गई है. हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमले, मंदिरों की तोडफ़ोड़, घरों-दुकानों में आगजनी और सोशल मीडिया के जरिए नफरत का संगठित प्रसार,ये संकेत हैं कि बांग्लादेश एक बार फिर अस्थिरता के खतरनाक मोड़ पर खड़ा है. ये आग की लपटें अगर समय रहते नहीं थामी गईं, तो उसका असर भारत की सीमाओं तक आना तय है. बांग्लादेश का इतिहास बताता है कि जब-जब वहां राजनीतिक सत्ता कमजोर हुई या कट्टरपंथी ताकतों को खुली छूट मिली, तब-तब अल्पसंख्यक सबसे आसान निशाना बने. मौजूदा हालात में भी वही पुराना पैटर्न दोहराया जा रहा है. हिंदू विरोधी हिंसा को ‘भीड़ का उग्र रूप’ कहकर टालना सच्चाई से मुंह मोडऩा होगा. यह सुनियोजित है, प्रायोजित है और इसके पीछे भारत-विरोधी मानसिकता भी साफ झलकती है.भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि बांग्लादेश से उसकी 4,000 किलोमीटर से अधिक की सीमा जुड़ी है. अस्थिर बांग्लादेश का सीधा असर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों,असम, त्रिपुरा, मेघालय और पश्चिम बंगाल पर पड़ता है. शरणार्थी संकट, सीमा पार घुसपैठ, कट्टरपंथी संगठनों की आवाजाही और तस्करी,ये सभी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़े खतरे हैं. इतिहास गवाह है कि 1971 से लेकर हाल के वर्षों तक, बांग्लादेश की उथल-पुथल का बोझ भारत को उठाना पड़ा है.

यह भी ध्यान देने योग्य है कि बांग्लादेश में सक्रिय कई कट्टरपंथी संगठन भारत को ‘रणनीतिक दुश्मन’ मानते हैं. हिंदू विरोधी हिंसा केवल धार्मिक उन्माद नहीं, बल्कि भारत के खिलाफ एक मनोवैज्ञानिक युद्ध का हिस्सा भी है. सोशल मीडिया पर भारत-विरोधी अफवाहें, सीमा से सटे इलाकों में तनाव और उग्र भाषण,ये सब आने वाले बड़े संकट की आहट हैं.

ऐसे में भारत के सामने दोहरी चुनौती है,एक ओर मानवीय मूल्यों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का प्रश्न, दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता की जिम्मेदारी. भारत अब 1970 या 1990 के दशक वाला कमजोर भारत नहीं है. वह एक उभरती शक्ति है, जिसकी आवाज क्षेत्रीय राजनीति में मायने रखती है. इसलिए केवल ‘चिंता व्यक्त करने’ या ‘अपील जारी करने’ से काम नहीं चलेगा.

भारत को कूटनीतिक स्तर पर सख्त संदेश देना होगा कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हिंसा बर्दाश्त नहीं की जा सकती. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाना, ढाका सरकार पर दबाव बनाना और जरूरत पडऩे पर लक्षित प्रतिबंधों पर विचार करना,ये सभी विकल्प खुले रखने होंगे. साथ ही, सीमा सुरक्षा को और मजबूत करना, खुफिया तंत्र को सक्रिय रखना और किसी भी आपात स्थिति के लिए रणनीतिक तैयारी करना अनिवार्य है.

यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि यदि हालात नियंत्रण से बाहर जाते हैं और भारत की सुरक्षा या सीमावर्ती राज्यों की स्थिरता पर सीधा खतरा पैदा होता है, तो भारत को अपने राष्ट्रीय हित में निर्णायक हस्तक्षेप से भी पीछे नहीं हटना चाहिए. यह हस्तक्षेप केवल सैन्य नहीं, बल्कि कूटनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक भी हो सकता है.

बांग्लादेश की धरती पर जल रही हिंसा की आग को भारत अनदेखा नहीं कर सकता. सतर्कता, सख्ती और स्पष्ट नीति,यही समय की मांग है. शांति की पहल तभी सफल होगी, जब शक्ति और संकल्प दोनों साथ-साथ चलें.

 

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