इंडिगो एयरलाइंस में हाल ही में हुआ परिचालन का विशाल संकट, सैकड़ों उड़ानों का रद्द होना, घंटों की देरी, हजारों यात्रियों की ठगी जैसी परेशानी ने भारतीय नागरिक उड्डयन क्षेत्र की असल तस्वीर सामने रख दी है. यह सिर्फ एक एयरलाइन की ‘आंतरिक गड़बड़ी’ नहीं थी, बल्कि उस प्रणाली की थकान भी थी, जिसे पिछले एक दशक में तेज़ी से बढ़ते हवाई यातायात के अनुरूप आधुनिक और जवाबदेह बनाया ही नहीं गया. इंडिगो की हिस्सेदारी 64 फीसदी तक पहुंच चुकी है, और यही एकाधिकार जैसे हालात इस संकट के दौरान पूरे सेक्टर को हिलाकर रख देने के लिए काफी थे. सरकार इस बार नींद से जागी है और जागनी भी चाहिए थी. जिन यात्रियों ने हज़ारों रुपये देकर टिकट खरीदा, जिन्हें घंटों एयरपोर्ट पर बैठा छोड़ा गया, जिनका सामान गायब हुआ, या जिनकी कनेक्टिंग फ्लाइट छूट गई
वे इस देश के नागरिक हैं, और उनका धैर्य किसी एयरलाइन की अव्यवस्था पर निर्भर नहीं रह सकता.पहला सबक यही कि विस्तार क्षमता देखकर नहीं, क्षमता बनाकर किया जाता है. इंडिगो ने उड़ानों की संख्या तो तेजी से बढ़ाई, पर उसके मुकाबले पायलट, तकनीकी स्टाफ और क्रू प्रबंधन का ढांचा उसी अनुपात में विकसित नहीं हुआ. डीजीसीए द्वारा लागू एफडीएल (उड़ान ड्यूटी समय सीमा) नियमों को लेकर एयरलाइन की लापरवाही ने स्थिति को और बिगाड़ा. पायलट थके हुए थे, क्रू शेड्यूल बिखरा हुआ था, और प्रबंधन स्थिति संभालने में नाकाम रहा.दूसरा सबक यह कि एकाधिकार कभी भी खतरा बन सकता है. एक एयरलाइन अगर लडख़ड़ाए और पूरा बाजार हिल जाए, तो यह बाज़ार की कमजोरी है, न कि मजबूती. तीसरा सबक यह कि यात्री अधिकार कानून किताबों में नहीं, जमीन पर लागू होने चाहिए. रिफंड में देरी, लगेज खोना, और कॉल सेंटर से राहत न मिलना, यह बताता है कि यात्री हितों की सुरक्षा सिर्फ घोषणाओं तक सीमित है.नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने जो कदम उठाए हैं, वे फिलहाल पर्याप्त हैं, क्योंकि पहली बार किसी बड़ी एयरलाइन पर इतनी कठोर सख्ती देखने को मिली है. यह कदम दिशा सही दिखाते हैं, लेकिन सवाल यह भी है कि ऐसी स्थिति बनने से पहले इसकी निगरानी क्यों नहीं हुई ? भविष्य का रास्ता ऑडिट, मॉनिटरिंग और यात्री-केंद्रित सुधार से होकर जाता है. सरकार ने अब जो बड़े सुधार घोषित किए हैं, वे सही दिशा में हैं जैसे सख्त एफडीएल लागू करना, सभी एयरलाइंस का परिचालन ऑडिट, रियल-टाइम किराया और उड़ान मॉनिटरिंग, यात्री अधिकारों में बड़ा सुधार, और इनमें सबसे महत्वपूर्ण है बाज़ार में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना. जाहिर है यह वेक-अप कॉल है और यदि यह भी व्यर्थ गया, तो अगला संकट और बड़ा होगा. इंडिगो संकट ने साफ बता दिया है कि भारतीय उड्डयन क्षेत्र को अब ‘जुगाड़ प्रबंधन’ से नहीं, व्यवस्थित और वैज्ञानिक प्रबंधन से चलाना होगा. यात्रियों की सुरक्षा, सुविधा और सम्मान — इन तीनों पर समझौता करने की गुंजाइश अब बिल्कुल नहीं है. सरकार ने इस बार कड़ा रुख दिखाया है, लेकिन वास्तविक बदलाव तभी दिखेगा जब नियमों का पालन रोज़ाना, हर उड़ान में, और पूरे सेक्टर में हो. यात्री अब सिर्फ उड़ान नहीं खरीदते, वे भरोसा खरीदते हैं और उस भरोसे की रक्षा करना सरकार और एयरलाइन, दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी है.
