हस्तशिल्प से लेकर पारंपरिक वस्तुओं की पहचान है विश्वरंग  

भोपाल। बांस से गोबर और फलों की बीज से बने आकर्षक उपकरण विश्वरंग 2025 की शोभा तो बढ़ा ही रहे हैं, साथ ही लोगों को अलग अलग संस्कृति का परिचय भी करा रहे हैं. प्रदर्शनी में लगे इन स्टालों पर यूं तो सुबह से ही भीड़ रहती हैं लेकिन शाम होते ही यहां ग्राहकों की भीड़ इतनी बढ़ जाती है. कि हर कोई बस विश्वरंग के गहरे रंगों में खोया नजर आता है.

हमारे पास असम की परम्परिक ज्वेलरी है जो कहीं और आसानी से नहीं मिलती। इनको किसी विशेष प्राकृतिक आकृति से प्रभवित होकर बनाया जाता है. जैसे चांद की आकृति में जूनसेट और जापी सेट जैसे कई गले का सेट सहित हाथों की ज्वेलरी है.इनको हाथों से बनाते हैं.

कुंजा दास, गुहाटी

बांस की सहायता से महिला समूहों के द्वारा डायनिंग टेबल में रखने वाले सेट, बांस की जड़ में हाथों की कारीगरी से विभिन्न आकृतियां और बोतल रखने के थैले भी बनाये जाते हैं. जिसे लोग खूब पसंद कर रहे हैं.

नारायण सरकार, त्रिपुरा

गोबर से कई उपयोगी चीजे बनाई जा सकती हैं जैसे हमने ये पेन स्टैंड, माड़ना पेंटिंग जिनका इस्तेमाल घरों को सजाने में किया जाता है. साथ ही शिवलिंग भी बना रहे हैं. इन सभी को बनाकर इसमें रंग भरने में समय लगता है. लेकिन बनने के बाद लोगों तक जब ये चीजें पहुचंती हैं तो अच्छा लगता है.

महिमा पाण्डेय, भोपाल

अखरोट के छिलकों और बीजों से असम में पहने जाने वाली पारंपरिक मालायें बनाई हैं. इसमें नाहोर, घीला और बैजंती की माला है. इसके अनोखे आकर और पैटर्न के कारण काफी लोग इसको आकर्षण के साथ देख रहे हैं.

अमित कुमार मंडल, असम

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