शहर के विकास का खाका मास्टर प्लान का ‘मायबाप’ कौन?

इंदौर: इंदौर के मास्टर प्लान को लेकर भोपाल से लेकर इंदौर तक किसी भी अधिकारी, नेता को मतलब नहीं है. यही कारण है कि 2021 के चार साल बीत जाने पर मास्टर प्लान को लेकर कोई भी गंभीर नजर नहीं आ रहा है.पहले शहर का मास्टर प्लान 17 साल बाद बना था. मास्टर प्लान को लेकर शासन की तरफ से अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया जा रहा है. इससे बढ़कर जनप्रतिनिधियों ने तो शहर को लावारिस ही छोड़ दिया है.

शहर के बाहरी क्षेत्रों में अनियोजित विकास की नींव डाली जा चुकी है. बाद में शासन के पास हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं रह जाएगा. निर्माण हटाना शासन और नेताओं के बस की बात नहीं रह गई है. इंदौर के मास्टर प्लान को लेकर भोपाल स्तर पर कोई गंभीरता नजर नहीं आ रही है. कहने को सिर्फ दो-तीन बार बैठकें हुई है और सुझाव मांगे गए, मगर नतीजा कुछ नहीं निकाला है. शहर का मास्टर प्लान पहले भी 17 साल बाद जारी हुआ था. उसका परिणाम यह हुआ कि ग्रीन बेल्ट में कॉलोनियां बस गई. आवासीय क्षेत्र में इंडस्टि्रयल उपयोग हो गया.

नया ग्रीन बेल्ट आवासीय क्षेत्र में बदल गया. सड़कों, ओवरब्रिज और सुव्यवस्थित विकास का ढांचा तैयार ही नहीं हो सका. इसका एक मात्र कारण समय पर मास्टर प्लान घोषित नहीं किया जाना है. ध्यान रहे कि मास्टर प्लान 1991 के बाद सरकार ने 2008 में मास्टर प्लान बनाया था. इतने वर्षों के बीच शहर में कई स्थानों पर अव्यवस्थित विकास और अवैध कॉलोनियों का अंबार लग गया. सड़कों की जगह अतिक्रमण हो गए, बगीचे तो गायब हो गए. स्थिति यह हो गई कि शहर का हरियाली क्षेत्र 18 प्रतिशत की जगह घट कर 5 प्रतिशत तक पहुंच गया.
शहर का तापमान 3 से 5 डिग्री बढ़ा
पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि आज शहर का तापमान सामान्य से 3 से 5 डिग्री तक बढ़ चुका है. कहने का तात्पर्य यह है कि यदि मास्टर प्लान समय पर जल्दी घोषित नहीं किया गया तो जमीनों पर बेतरतीब ढंग से विकास होता रहेगा. भले ही 79 गांव की जमीनों पर विकास अनुमति पर रोक लगा रखी हो. अवैध निर्माण और काम तो निरंतर जारी है. स्थिति यह है कि ग्रीन बेल्ट और सड़कों के बाद में घोषित होने पर कई कॉलोनियां, बहुमंजिला इमारतें, इंडस्ट्री से लेकर हर क्षेत्र में अनियोजित विकास जमकर चल रहा है. इसको लेकर मेट्रो रेल जैसी योजना का प्लान भी नहीं बन पाएगा. वैसा ही हाल होगा जो खजराना के आगे बढ़ने में दो साल हो गए और काम रुका हुआ है. यही हाल मास्टर प्लान की सड़कों का है, जो आज तक पूरे शहर में सभी 30 सड़कें अधूरी है. इसकी वजह यह है कि हर सड़क पर अतिक्रमण और बाधक है, जिसको हटाने में अधिकारी से लेकर शासन को पसीने छूट रहे हैं.
प्रदेश से लेकर स्थानीय अधिकारी भी उदासीन
इंदौर हमेशा से स्वयं का विकास करता रहा है. इस शहर को लेकर कलेक्टर से लेकर कमिश्नर तक सभी अधिकारी दूसरी तरफ ज्यादा ध्यान लगाते हैं. शहर की विकास योजना लागू करने और बनवाने में अधिकारियों की भी कोई रुचि नहीं दिखती है. प्रदेश के अधिकारी तो…. हां देखते है, कहकर अभी तक टालते रहे है. आखिर इंदौर विकास योजना कौन बनाएगा और कब बनेगा? किसी को पता नहीं है. विभाग प्रमुख सचिव ने भी जल्दी मास्टर प्लान घोषित करने का कहा था, लेकिन उस बात को भी तीन माह बीत चुके हैं.
जनप्रतिनिधियों की शहर के प्रति अनदेखी क्यों…?
मास्टर प्लान को लेकर महापौर, 9 विधायक और एक सांसद सहित 11 शहर के जनप्रतिनिधि है. 85 पार्षद, जिसमें 60 पार्षद सत्ताधारी दल के है और साथ में प्रदेश सरकार भी सत्ताधारी दल की ही है. खास बात यह है कि मास्टर प्लान से संबंधित स्थानीय विधायक जो कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के पास ही है. इसके बावजूद मास्टर प्लान को लेकर किसी विधायक, सांसद और महापौर द्वारा आवाज नहीं उठाना, मास्टर प्लान तैयार करने की बात नहीं करना? इसको क्या समझा जाए?
बताया जा रहा है कि मास्टर प्लान में 79 गांव की जमीन शामिल की गई है और 3 जिलों की सीमा से सीधा जोड़ दिया है. करीब 950 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में मास्टर प्लान का एरिया होगा.

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