महिला मतदाताओं का निर्णायक उभार

सोमवार को जैसे ही बिहार विधानसभा चुनाव की तिथियों की घोषणा हुई, राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच गई. परंतु इस बार माहौल में एक नया आयाम स्पष्ट दिखाई दे रहा है,महिला मतदाताओं की निर्णायक भूमिका. बिहार की राजनीति में महिलाएं अब मात्र “सहायक मतदाता” नहीं रहीं, बल्कि नीतियों, अभियानों और चुनावी रणनीतियों के केंद्र में आ चुकी हैं. हर दल इस शक्ति को महसूस कर रहा है और अपने-अपने तरीके से उन्हें आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है.

दरअसल, पिछले दो दशकों में बिहार में महिला मतदाताओं की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. 2020 के विधानसभा चुनाव में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से लगभग चार $फीसदी अधिक था. ग्रामीण इलाकों में तो यह अंतर और भी ज्यादा था. नीतीश कुमार की “सशक्त नारी-सशक्त बिहार” जैसी योजनाओं ने एक समय महिला वोट बैंक को सुचारु रूप से संगठित किया, जिसने उन्हें लगातार सत्ता में बने रहने का आधार भी दिया. लेकिन अब परिदृश्य बदल चुका है,महिला मतदाता केवल “लाभार्थी” नहीं रहीं, बल्कि वे अब नीति-निर्धारण की सहभागी और सशक्त समीक्षक बन चुकी हैं.यही कारण है कि तेजस्वी यादव से लेकर प्रशांत किशोर तक, हर राजनीतिक चेहरा महिलाओं तक सीधा संवाद स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. तेजस्वी अपनी सभाओं में “समान काम, समान वेतन” और महिला सुरक्षा के मुद्दे उठाते हैं, तो प्रशांत किशोर अपने जन सुराज अभियान के जरिए पंचायत स्तर पर महिला नेतृत्व को प्राथमिकता दे रहे हैं. भाजपा और जदयू अपने पारंपरिक महिला कल्याण योजनाओं—उज्ज्वला, हर घर नल, साइकिल योजना, और स्वयं सहायता समूहों के सहारे इस तबके में भरोसा बनाए रखने में जुटी हैं.राजनीति के जानकार मानते हैं कि बिहार में महिलाओं की राजनीतिक चेतना अब जाति और परंपरा से आगे निकल चुकी है. उन्हें यह एहसास हो गया है कि उनका वोट शिक्षा, रोजगार, और सामाजिक सुरक्षा से सीधे जुड़ा है. यही कारण है कि राजनीतिक दलों की चुनावी घोषणाओं में अब महिला उद्यमिता, स्वास्थ्य, पोषण और डिजिटल साक्षरता जैसे बिंदु प्रमुखता से शामिल किए जा रहे हैं.

इस बार चुनावी प्रचार में यह भी देखने को मिल रहा है कि महिला नेतृत्व को प्रतीक के रूप में नहीं, विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. युवा महिला उम्मीदवारों को टिकट देने, महिला पंचायत प्रमुखों और स्वयं सहायता समूहों की ब्रांड एम्बेसडर के रूप में भागीदारी बढ़ाने की प्रवृत्ति तेज हुई है. यह बिहार की सामाजिक-राजनीतिक संरचना में गहरे परिवर्तन का संकेत है.कुल मिलाकर, 2025 का बिहार चुनाव इस बात की परीक्षा भी होगा कि क्या महिलाओं की बढ़ती राजनीतिक चेतना वास्तव में सत्ता परिवर्तन का निर्णायक कारण बन सकती है या नहीं . यह भी स्पष्ट है कि अब जो दल महिला मतदाता को केवल “लाभार्थी वर्ग” समझेगा, उसे झटका लगना तय है.

बिहार की राजनीति में महिला मतदाताओं की यह नई जागरूकता केवल किसी एक दल के पक्ष में नहीं, बल्कि लोकतंत्र की दिशा तय करने वाली एक शांत क्रांति है. आने वाले वर्षों में इसका प्रभाव न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश की राजनीति पर गहराई से महसूस किया जाएगा.

 

 

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