आत्मनिर्भर भारत और सामाजिक समरसता की आवश्यकता

नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शताब्दी वर्ष का उत्सव मनाते हुए संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत का मार्गदर्शक संबोधन प्रस्तुत किया. यह भाषण केवल संघ कार्यकर्ताओं के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए विचार करने योग्य था. इसमें स्वदेशी से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक समरसता से लेकर पर्यावरण और पड़ोसी देशों की चुनौतियों तक—भारत के भविष्य को प्रभावित करने वाले सभी बिंदुओं को समाहित किया गया.

सबसे पहले, स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर दिया गया संदेश आज की वैश्विक परिस्थितियों में अत्यंत प्रासंगिक है. अमेरिका और अन्य देशों की टैरिफ नीतियां विश्व व्यापार को झकझोर रही हैं. ऐसे समय में भारत के लिए “स्वावलंबन” केवल आर्थिक विकल्प नहीं, बल्कि अस्तित्व और गरिमा की शर्त है. यह गांधीजी के स्वदेशी विचारों का आधुनिक रूपांतरण है. डॉक्टर भागवत ने यह स्पष्ट किया कि आत्मनिर्भरता हमें विदेशी दबावों और आर्थिक असमानताओं से मुक्त कर सकती है.

दूसरा बड़ा मुद्दा था राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद. अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुआ आतंकी हमला केवल एक जघन्य अपराध नहीं, बल्कि भारत की आस्था और विविधता पर सीधा प्रहार था. 26 निर्दोष भारतीयों को धर्म पूछकर मौत के घाट उतारने की घटना ने आतंकवाद का क्रूर चेहरा सामने ला दिया. भागवत का यह कहना कि “इस घटना ने सच्चे मित्र और शत्रु की पहचान करा दी,” हमारे विदेश और सुरक्षा नीति की गहरी वास्तविकता को उजागर करता है. भारत को सजग और सक्षम बने रहना होगा,यह केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि नागरिकों का भी साझा दायित्व है.सामाजिक समरसता और हिंदू राष्ट्रीयता पर संघ प्रमुख का विचार उनके लंबे चिंतन का परिणाम है. उन्होंने विविधताओं को विभाजन का कारण न मानकर, उन्हें भारतीयता के सूत्र में पिरोने की बात कही. “हिंदू, हिंदवी या आर्य”,इन शब्दों के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भारत की राष्ट्रीयता का मूल तत्व सांस्कृतिक एकात्मता है, जो सभी को समाहित करता है. आज जब जाति, भाषा और धर्म के नाम पर समाज में विभाजन की राजनीति हो रही है, तब यह विचार संतुलन और समन्वय का मार्ग सुझाता है.पड़ोसी देशों में अस्थिरता को लेकर जताई गई चिंता भी भारत की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ी है. नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश में उथल-पुथल का असर भारत पर पडऩा स्वाभाविक है. भागवत का यह कहना कि हिंसा स्थायी परिवर्तन का उपाय नहीं हो सकती, दक्षिण एशिया की राजनीति के लिए एक संतुलित परामर्श है.पर्यावरण और प्राकृतिक आपदाओं के संदर्भ में संघ प्रमुख ने हिमालय की सुरक्षा को केंद्र में रखा. यह न केवल भारत बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए जीवनरेखा है. उपभोक्तावादी विकास मॉडल से पैदा हुई आपदाएं इस चेतावनी को और भी गंभीर बना देती हैं.इतिहास और संस्कृति के संदर्भ में उन्होंने गुरु तेग बहादुर और महात्मा गांधी के बलिदानों को याद किया. यह संकेत है कि संघ अपने शताब्दी वर्ष में केवल संगठनात्मक उपलब्धियों का उत्सव नहीं मना रहा, बल्कि भारत की आत्मा को पोषित करने वाली परंपराओं से प्रेरणा भी ले रहा है. कुल मिलाकर संघ के पंच परिवर्तन कार्यक्रम,सामाजिक सद्भाव, पारिवारिक मूल्य, पर्यावरण संरक्षण, स्वत्व और स्वावलंबन, तथा नागरिक कर्तव्य, आने वाले दशकों के लिए भारतीय समाज की दिशा तय कर सकते हैं. यह कार्यक्रम संघ के शताब्दी वर्ष को भविष्य के निर्माण की आधारशिला बनाता है.स्पष्ट है कि मोहन भागवत का विजयादशमी संदेश केवल उत्सव का भाषण नहीं, बल्कि भारत के सामने उपस्थित चुनौतियों और अवसरों का घोषणापत्र है. आत्मनिर्भरता, सुरक्षा, समरसता, पर्यावरण और सांस्कृतिक चेतना—इन पांच आधारों पर भारत का भविष्य टिकेगा. शताब्दी वर्ष का यह उद्घोष हमें बताता है कि संघ के लिए शाखा केवल संगठनात्मक अनुशासन का केंद्र नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का जीवंत प्रयोगशाला है.

 

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