दूरदर्शन की सुनहरी यादों से सराबोर मंडला का दुर्गोत्सव पंडाल

मंडला: मंडला जिले में इस वर्ष दुर्गा पूजा का उत्साह एक खास रंग में डूबा हुआ है। जिले भर में दुर्गोत्सव समितियां माँ दुर्गा को अलग-अलग रूप में विराजमान किये है, जो आलौकिक है। ऐसी ही एक दुर्गोत्सव समिति जिला मुख्यालय के नजदीकी ग्राम पंचायत देवदरा में नव जागृति नौ दुर्गोत्सव समिति देवदरा द्वारा अपने पंडाल को मेरा बचपन मेरा दूरदर्शन थीम पर सजाकर श्रद्धालुओं को 90 के दशक की सुनहरी यादों में डुबो दिया है। इस अनूठी पहल ने स्थानीय लोगों और दूर-दराज से आए भक्तों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।

नव जागृति नौ दुर्गोत्सव समिति ने पंडाल को दूरदर्शन के प्रतिष्ठित मोनो की विशाल झांकी का रूप दिया है, जिसके ठीक मध्य में माता दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की गई है। यह आकर्षक संयोजन एक जीवंत टाइम कैप्सूल जैसा प्रतीत होता है, जो लोगों को तुरंत अपने बचपन की ओर खींच ले जाता है। इस थीम को जीवंत करने के लिए पंडाल में एक विशेष चित्र प्रदर्शनी भी लगाई गई है।

इस प्रदर्शनी में 90 के दशक की लोकप्रिय जीवनशैली, खिलौनों और आउटडोर खेलों पर आधारित तस्वीरें प्रदर्शित की गई हैं। दर्शकों को यहां उस दौर के लोकप्रिय टीवी कार्यक्रमों, बच्चों के उपयोग की वस्तुओं और गलियों में खेले जाने वाले खेलों की झलक देखने को मिल रही है।समिति के सदस्यों का कहना है कि इस झांकी का मुख्य उद्देश्य लोगों को आधुनिकता की अंधी दौड़ में खोती जा रही पुरानी संस्कृति, साधारण जीवनशैली और बचपन की मासूमियत से फिर से जोडऩा है। उनका मानना है कि दूरदर्शन उस दौर में परिवार के एक सदस्य जैसा था, जिसने लाखों बच्चों को स्वस्थ मनोरंजन और शिक्षा प्रदान की। यह थीम नई पीढ़ी को उस दौर की सादगी और खुशियों से परिचित कराने का भी एक प्रयास है।

इस रचनात्मक और नॉस्टैल्जिक थीम को स्थानीय लोगों का भरपूर समर्थन मिल रहा है। बच्चे जहां उत्सुकता से उन पुरानी चीज़ों और खेलों के बारे में जान रहे हैं, जिन्हें उन्होंने केवल कहानियों में सुना है, वहीं बड़े-बुजुर्ग अपने पुराने दिनों को याद कर भावुक हो रहे हैं। पंडाल में आने वाला हर व्यक्ति प्रदर्शनी में खो जाता है, मानो वह कुछ देर के लिए अपने बचपन में लौट गया हो।

नव जागृति दुर्गोत्सव समिति की यह अभिनव प्रस्तुति मंडला जिले के सांस्कृतिक कैलेंडर में एक यादगार पल बन गई है, जो धर्म के साथ सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक संरक्षण का संदेश भी दे रही है। समिति के सदस्यों का कहना है कि दुर्गोत्सव पंडाल सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि 90 के दशक की सामूहिक स्मृति का केंद्र भी बन गया है।

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