प्रमोशन में आरक्षण: जब सर्वोच्च रोक है तो फिर कैसे दी जा रही पदोन्नति

जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट में प्रमोशन में आरक्षण मामले में मंगलवार को सुनवाई हुई। हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा कि जब पुरानी पॉलिसी को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है और मामला विचाराधीन है तो नई पॉलिसी क्यों लाई गई। चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली युगलपीठ ने पूछा है कि यदि शीर्ष अदालत ने यथास्थिति बनाए रखने कहा है तो यहां नए नियम के तहत क्यों दिए जा रहे प्रमोशन। सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन याचिकाएं यदि स्वीकार की जाती है तो नए के तहत किए जाने वाले पदोन्नति पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यदि याचिकाएं निरस्त होती हैं तो नए नियम के तहत किए जाने वाली पदोन्नति पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

दरअसल भोपाल निवासी डॉॅ. स्वाति तिवारी व अन्य की ओर से दायर याचिकाओं में मध्यप्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम 2025 को चुनौती दी गई है। दलील दी गई कि वर्ष 2002 के नियमों को हाई कोर्ट के द्वारा आरबी राय के केस में समाप्त किया जा चुका है। इसके विरुद्ध मप्र शासन ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट में मामला अभी लंबित है, इसके बावजूद मप्र शासन ने महज नाममात्र का शाब्दिक परिवर्तन कर जस के तस नियम बना दिए। वहीं मामले में अजॉक्स संघ सहित आरक्षित वर्ग की ओर से अनेक अधिकारियों व कर्मचारियों ने इस मामले में हस्तक्षेप याचिकाएं दाखिल की हैं। इनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नमन नागरथ, रामेश्वर सिंह ठाकुर, आकाश चौधरी, विनायक प्रसाद शाह, वरुण ठाकुर ने सरकारी विभागों मे प्रतिनिधित्व के क्वांटिफाइबल डेटा प्रस्तुत किए। याचिकाओं में आरक्षण के विरोध वाले याचिकाकर्ताओं के प्रभावित होने वाले विधिक अधिकार पर प्रश्न उठाया। सभी मामलों पर अब एकसाथ सुनवाई होगी। मप्र शासन की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन एवं महाधिवक्ता प्रशान्त सिंह ने कहा कि सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से परिपत्र जारी कर वर्तमान स्थिति पर स्पष्टीकरण जारी करेंगे। जिस पर न्यायालयन ने कहा अब स्पष्टीकरण आने के बाद सुनवाई करेंगे। अगली सुनवाई 25 सितंबर को निर्धारित की गई है। महाधिवक्ता के पूर्व में दिए मौखिक अंडरटेकिंग के चलते फिलहाल नई पॉलिसी से प्रमोशन रुके हुए हैं।

 

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