प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मणिपुर दौरा, हिंसा के दो वर्ष बाद भले ही देर से हुआ हो, लेकिन उसका संदेश स्पष्ट और ठोस था—शांति और विकास ही राज्य की असली दिशा है. 7,000 करोड़ रुपए की विकास परियोजनाएं और विस्थापित परिवारों के लिए 3,000 करोड़ रुपए का पैकेज यह दर्शाता है कि केंद्र सरकार केवल शब्दों में नहीं, बल्कि ठोस योजनाओं के साथ मैदान में उतरी है .
मणिपुर की समस्या केवल कानून-व्यवस्था की नहीं है. यह राज्य की पहचान, जातीय अस्मिता और दशकों से पनपे अविश्वास की समस्या है. कुकी और मैतेई समुदाय के बीच बढ़ती दूरी, नागा समाज की अलग चिंताएं और स्थानीय नेतृत्व की सीमाएं,इन सबने हालात को और कठिन बना दिया है. यहां सिर्फ पैकेज से समाधान नहीं होगा, बल्कि विश्वास की पुनर्बहाली ही स्थायी रास्ता है.मोदी ने चुराचांदपुर जाकर कुकी परिवारों से मुलाकात की और इंफाल में लोगों को संबोधित कर एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत दिया कि सरकार मणिपुर के हर समुदाय के साथ खड़ी है. सडक़ों, शहरी विकास और आईटी सेक्टर पर जोर देकर उन्होंने यह भी जताया कि मणिपुर को अलगाव से निकालकर अवसरों की मुख्यधारा में लाना ही लक्ष्य है.अब चुनौती यह है कि घोषणाओं को जमीनी हकीकत में कैसे बदला जाए. राजनीतिक स्तर पर केंद्र और राज्य को मिलकर एक निष्पक्ष और पारदर्शी नेतृत्व देना होगा. इसी के साथ सामाजिक स्तर पर मणिपुर के संघर्षरत समुदायों के बीच संवाद और शांति समितियां बनाकर विश्वास बहाली करनी होगी.
आर्थिक स्तर पर युवाओं के लिए रोजगार और स्थानीय उद्योग को बढ़ावा देना अनिवार्य है. यही हिंसा की जमीन को कमजोर करेगा.
दरअसल,मणिपुर आज भी जातीय विभाजन और अविश्वास की आग से जूझ रहा है.2023 की हिंसा ने राज्य की एकता को गहरी चोट दी. प्रधानमंत्री मोदी की हालिया यात्रा और विकास पैकेज उम्मीद की किरण जरूर है, पर स्थायी समाधान केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति, सामाजिक संवाद और आर्थिक अवसरों से ही संभव होगा. मणिपुर की विविधता उसकी ताकत है, बशर्ते उसे संघर्ष का कारण नहीं, सहयोग का आधार बनाया जाए.
कुल मिलाकर मणिपुर की धरती विविधताओं से भरी है. यही विविधता यदि सहयोग की शक्ति बने तो राज्य प्रगति की राह पर तेजी से आगे बढ़ सकता है. प्रधानमंत्री मोदी ने सही कहा कि मणिपुर आशा और आकांक्षाओं की भूमि है. अब यह आशा तभी साकार होगी जब शांति स्थायी बने और विकास का लाभ हर समुदाय तक पहुंचे.
