नेपाल और फ्रांस ! दो भौगोलिक रूप से दूरस्थ और सांस्कृतिक रूप से भिन्न देश, लेकिन दोनों की सडक़ों पर इस समय एक समान दृश्य है, असंतोष, आक्रोश और हिंसा. एक ओर नेपाल का राजनीतिक संकट अंतरिम व्यवस्था की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है, तो दूसरी ओर फ्रांस की राजधानी पेरिस की सडक़ों पर धुआं और आगजनी ने यूरोप को अस्थिरता का नया संदेश दिया है. सवाल यह है कि इन दोनों घटनाओं में समान सूत्र क्या है और दुनिया को इससे क्या सीख लेनी चाहिए.
नेपाल में हालात लंबे समय से अस्थिर रहे हैं. संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा घटा है और राजनीतिक दलों के बीच अंतहीन खींचतान ने आम नागरिकों को निराश किया है. ऐसे समय में राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल की अगुवाई में हुई बैठक में पूर्व प्रधान न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम सरकार का नेतृत्व सौंपने पर लगभग सहमति बनना, लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है. कार्की न केवल न्यायपालिका में अपनी ईमानदार छवि के लिए जानी जाती हैं, बल्कि उन्हें निष्पक्ष और सख्त प्रशासक के रूप में भी देखा जाता है. हालांकि संसद भंग करने जैसे मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं, लेकिन फिर भी देश को संवैधानिक मार्ग पर वापस लाने की कोशिशें दिखाई दे रही हैं. नेपाल का यह प्रयोग यह भी दर्शाता है कि जब दलगत राजनीति गतिरोध पैदा करती है, तब समाज को स्थिरता देने के लिए तटस्थ और निष्पक्ष व्यक्तित्व की ओर देखा जाता है.
दूसरी ओर, फ्रांस में स्थिति अलग है लेकिन मूल कारण लगभग समान है यानी असंतोष. नेपाल में यह असंतोष राजनीतिक अविश्वास का परिणाम है, जबकि फ्रांस में यह सामाजिक असंतोष के रूप में फूटा है. पेरिस की सडक़ों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों की भिड़ंत, आगजनी और सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान इस ओर इशारा करता है कि नागरिक व्यवस्था के प्रति आक्रोशित हो उठे हैं. आंतरिक मंत्री ब्रूनो रिटेलेउ के अनुसार, प्रदर्शनकारी विद्रोह का माहौल बनाना चाहते हैं. लेकिन सवाल यह भी है कि इतनी बड़ी संख्या में लोग अचानक क्यों सडक़ों पर उतर आए ? स्पष्ट है कि इसके पीछे सोशल मीडिया की भूमिका अहम रही. नेपाल में भी आंदोलन और असंतोष के स्वर अक्सर डिजिटल प्लेटफॉर्मों से शुरू होकर सडक़ों तक पहुंचते हैं.
इन दोनों देशों के हालात यह दिखाते हैं कि शासन व्यवस्था पर लोगों का भरोसा घटने लगे तो परिणाम हिंसा और अराजकता के रूप में सामने आते हैं. फ्रांस जैसे परिपक्व लोकतंत्र में भी पुलिस को 80,000 से अधिक सुरक्षा बलों की तैनाती करनी पड़ी, यह स्थिति दर्शाती है कि लोकतांत्रिक ढांचे की मजबूती केवल संविधान और संस्थाओं पर नहीं, बल्कि नागरिकों के विश्वास पर भी टिकी होती है.दरअसल,
नेपाल में कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनना राजनीतिक संकट से निकलने की संभावना जगाता है.
दोनों घटनाएं इस तथ्य को रेखांकित करती हैं कि आज का वैश्विक समाज असंतोष की चिंगारियों से भरा हुआ है, जो क्षणभर में अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बन सकता है.भारत सहित विश्व के अन्य लोकतंत्रों को इन घटनाओं से सबक लेना होगा. लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनावों से नहीं आती, बल्कि संस्थाओं की पारदर्शिता, न्यायपालिका की निष्पक्षता और नागरिकों के आक्रोश को सुनने की तत्परता से सुनिश्चित होती है. नेपाल में सुशीला कार्की का नाम सहमति के साथ उभरना और फ्रांस में सरकार का कठोर रुख—ये दोनों उदाहरण हमें यह बताते हैं कि लोकतंत्र का भविष्य संतुलन, संवाद और संवैधानिक आचरण पर ही टिका है.नेपाल और फ्रांस की यह अस्थिरता वैश्विक चेतावनी है कि असंतोष की ज्वाला किसी सीमा में बंधी नहीं रहती. इसे रोकने के लिए पारदर्शी नेतृत्व और जनता के प्रति जवाबदेही अनिवार्य है.
