आईजीएनसीए द्वारा ‘चतुर्थ आनन्द केंटिश कूमारस्वामी स्मृति व्याख्यान’ का आयोजन

नयी दिल्ली, 10 सितंबर (वार्ताः इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के सांस्कृतिक अभिलेखागार एवं संरक्षण प्रभाग द्वारा मंगलवार को ‘चतुर्थ आनन्द केंटिश कूमारस्वामी स्मृति व्याख्यान’ का आयोजन किया गया। इसका विषय ‘द ओरिजिन ऑफ अनदर बुद्धा इमेज’ थआ और मुख्य वक्ता जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली के प्रो. नमन पी. आहूजा थे।

व्याख्यान की अध्यक्षता रिटायर्ड आईएएस प्रख्यात कला इतिहासकार और आईजीएनसीए के पूर्व सदस्य सचिव डॉ. कल्याण कुमार चक्रवर्ती ने की। आईजीएनसीए के सांस्कृतिक अभिलेखागार एवं संरक्षण प्रभाग के अध्यक्ष प्रो. अचल पण्ड्या ने व्याख्यान की रूपरेखा प्रस्तुत की और अतिथियों का परिचय दिया।

अपने व्याख्यान में प्रो. नमन पी. आहूजा ने बौद्ध प्रतिमाओं के नए पुरातात्त्विक खोजों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राचीन टेराकोटा और हाथीदांत की मूर्तियों में ऐसे रूप प्राप्त हुए हैं, जो मथुरा, गांधार और अमरावती की प्रचलित प्रतिमाओं से भिन्न हैं। इन खोजों ने भारतीय कला में बौद्ध आईकॉनोग्राफी (छवि निरूपण) और धार्मिक इतिहास को नए सिरे से समझने की दिशा प्रदान की है। उन्होंने कहा कि प्राचीन टेराकोटा और हाथीदांत में अंकित बोधिसत्वों और यहां तक कि संभवतः सिद्धार्थ की प्रतिमाओं की हालिया खोज उन्हें ऐसी शैलियों और रूपों में दर्शाती है, जो मथुरा, गांधार या अमरावती की प्रसिद्ध प्रतिमाओं से बिल्कुल अलग हैं।

डॉ. कल्याण कुमार चक्रवर्ती ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि भारत में ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक संपदा का अथाह भंडार है, लेकिन इस पर बहुत काम नहीं हुआ है। उनका व्यापक अध्ययन किया जाना चाहिए। उन्होंने कार्बन डेटिंग पर सवाल खड़े किए और कहा, “कार्बन डेटिंग के संबंध में, मेरी एक असहमतिपूर्ण राय है। मुझे लगता है कि कार्बन डेटिंग केवल ऐतिहासिक अवशेषों के लिए ही प्रासंगिक है।” उन्होंने कहा कि कार्बन डेटिंग एक प्रकार की ‘होली काऊ’ है, जिसका उपयोग हर जगह किया जाता है, मानो यही पूर्ण सत्य हो। लेकिन कार्बन डेटिंग संदिग्ध है, विशेष रूप से प्रागैतिहासिक कला के संबंध में।

अंत में, सांस्कृतिक अभिलेखागार प्रभाग की प्रभारी और असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शिल्पी राय ने वक्ताओं और आगंतुको के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में कला, इतिहास और संस्कृति के शोधार्थी, अध्यापक, विद्वत्जन और कला-प्रेमी शामिल हुए। प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला यह व्याख्यान कुमारस्वामी द्वारा कला एवं संस्कृति पर स्थापित मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित होता है।

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