विरासत का विलोपन या विकास की विडंबना?

(सुधीर शर्मा)सीतामऊ।वह नगर जो रियासतकाल से शिक्षा, संस्कृति और अध्यात्म का केन्द्र रहा है, आज स्वयं अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। जिस श्री राम विद्यालय ने 1919 में अंग्रेजी हुकूमत के बीच शिक्षा की मशाल जलाई थी, और जिस सरस कुंवर कन्या विद्यालय ने बालिकाओं को शिक्षा का अधिकार दिया, उन्हीं ऐतिहासिक संस्थाओं को अब विकास के नाम पर बंद करने की तैयारी चल रही है।

लोक शिक्षण संचालनालय के निर्देश के अनुसार इन दोनों विद्यालयों का विलय लदुना स्थित एक अन्य स्कूल में किया जाना प्रस्तावित है। कागज़ों में यह कदम व्यवस्थागत सुधार जैसा प्रतीत हो सकता है, लेकिन धरातल पर यह सीतामऊ की शैक्षणिक पहचान को मिटाने का प्रयास है।

यह मात्र दो विद्यालयों का बंद होना नहीं है। यह उस शैक्षणिक विरासत का क्षरण है, जिसने नगर को ‘छोटी काशी’ जैसी उपाधि दिलाई। क्या सीतामऊ की जनता से यह पूछना आवश्यक नहीं था कि उनकी ऐतिहासिक धरोहर को बिना विमर्श के कैसे खत्म किया जा सकता है?

और सबसे बड़ा प्रश्न क्या हमारे निर्वाचित प्रतिनिधि अब इतने मौन हो गए हैं कि वे अपने क्षेत्र की आवाज़ भी नहीं बन पा रहे?

विधायक, सांसद और स्थानीय नेतृत्व की चुप्पी ने जनमानस में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सीतामऊ को जानबूझकर हाशिए पर तो नहीं डाला जा रहा? पहले विधानसभा का स्थानांतरण और अब स्कूलों का विलय यह केवल संयोग नहीं, एक संकेत है।

यह समय राजनीति से ऊपर उठने का है। यह आंदोलन किसी पार्टी विशेष का नहीं, बल्कि सीतामऊ की आत्मा की रक्षा का आंदोलन होना चाहिए।

नगर की जनता, प्रबुद्ध नागरिकों, युवाओं और विद्यार्थियों को इस निर्णय का शांतिपूर्ण परंतु सशक्त विरोध करना चाहिए। यह लड़ाई सिर्फ विद्यालयों को बचाने की नहीं, आने वाली पीढ़ियों को उनकी जड़ों से जोड़ने की लड़ाई है।

अगर आज चुप रहे, तो कल इतिहास चुप नहीं रहेगा।

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