कैनबरा ,14 जुलाई (वार्ता) ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ता कृषि के एक नए तरीके का परीक्षण कर रहे हैं। यह कृषि लागतों को कम करने के साथ-साथ जलवायु में कार्बन उत्सर्जन को भी कम करने में मदद करेगा।
खदानों और निर्माण कार्यों से प्राप्त होने वाला ज्वालामुखी बेसाल्ट चूर्ण किसानों के लिए कृषि लागतों को कम करने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने में भी मदद कर सकता है।
दक्षिणी आस्ट्रेलिया विश्वविद्यालय में वरिष्ठ शोधकर्ता बिनय सरकार ने सोमवार को बताया कि बेसाल्ट चूर्ण पर एक राष्ट्रीय परीक्षण हो रहा है। यह प्रति टन पर केवल 30 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर की लागत से मिट्टी की अमलीयता कम कर फसलों का उत्पादन बढ़ा सकती है और कार्बन कैप्चर में मदद कर सकती है।
कार्बन कैप्चर एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कार्बन डाइऑक्साइड को वातावरण में नहीं जाने दिया जाता। उसे या तो स्थायी रूप से संग्रहीत किया जाता है या उसका उपयोग किया जाता है।
उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलियाई किसान मृदा अम्लीयता से निपटने के लिए हर साल लगभग 1.2 बिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर खर्च करते हैं। इसके लिए जिन महंगे चूना पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है वह ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करते हैं।
बेसाल्ट न केवल मृदा की अम्लीयता को कम करता है, बल्कि फॉस्फोरस, कैलशियम, मैगनेशियम और सिलिकॉन जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व भी प्रदान करता है।
कृषि क्षेत्र में ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में ऑस्ट्रेलिया का लगभग 18 योगदान है। चूना-पदार्थ की जगह बेसाल्ट का इस्तेमाल इस उत्सर्जन को कम कर 2050 तक शून्य स्तर प्राप्त करने में मदद कर सकता है।
अगर यह प्रयोग सफल हुआ तो इस तकनीक की मदद से इसे बडे़ स्तर पर अपनाया जा सकता है। यह किसानों को कार्बन क्रेडिट अर्जित करने और संधारणीय विधियों को अपनाने में मदद कर सकता है।
बेसाल्ट चूर्ण शोध पर सरकारी और निजी क्षेत्र की दो परियोजनाएं चल रही हैं। इसमें दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया विश्वविद्यालय, कूक विश्वविद्यालय, ट्रॉपिकल नॉर्थ क्विन्सलैंड ड्राउट हब और औद्याेगिक क्षेत्र इसमें सहयोग कर रहे हैं।

