ब्राजील के रियो डी जनेरियो में संपन्न हुआ 17वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन, अपने पारंपरिक आर्थिक सहयोग के एजेंडे से हटकर, कुछ अधिक मूलभूत और सामयिक मुद्दों पर केंद्रित रहा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति और उनके दो टूक बयानों ने सम्मेलन को एक नई दिशा दी, खासकर आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक एकजुटता और मौजूदा वैश्विक संस्थानों में सुधार की आवश्यकता पर. यह शिखर सम्मेलन इस बात का प्रमाण है कि ब्रिक्स अब केवल एक आर्थिक मंच नहीं, बल्कि वैश्विक चुनौतियों पर अपनी सशक्त आवाज उठाने वाला एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक समूह बन रहा है.
पहलगाम में हुए हालिया आतंकी हमले की पृष्ठभूमि में, प्रधानमंत्री मोदी का आतंकवाद पर सीधा और स्पष्ट रुख बेहद महत्वपूर्ण था. उन्होंने आतंकवाद को “मानवता पर हमला” बताते हुए न केवल इसकी कड़ी निंदा की, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि आतंकवाद के पीडि़तों और उसके समर्थकों को एक ही तराजू पर नहीं तोला जा सकता. यह बयान उन देशों को सीधा संदेश था जो आतंकवाद को “रणनीतिक हथियार” के रूप में इस्तेमाल करते हैं या आतंकवादियों को पनाह देते हैं, अक्सर उन्हें राज्य-प्रायोजित आतंकवाद के आरोप से बचाते हुए.
ब्रिक्स घोषणापत्र में पहलगाम हमले का उल्लेख और आतंकवाद से निपटने में “दोहरे मापदंडों” को खारिज करने का आह्वान भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत है. यह वैश्विक मंच पर भारत की उस पुरानी मांग को बल देता है कि आतंकवाद के खिलाफ एक एकीकृत और अविभाजित दृष्टिकोण होना चाहिए, जिसमें किसी भी प्रकार की अस्पष्टता या चुनिंदा कार्रवाई की गुंजाइश न हो. लंबे समय से भारत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जोर देता रहा है कि आतंकवाद को अच्छे या बुरे आतंकवाद के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता. ब्रिक्स की यह सहमति वैश्विक समुदाय में आतंकवाद के खिलाफ शून्य सहिष्णुता की नीति को मजबूत करती है.आतंकवाद के अलावा, प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक संस्थानों में सुधार की तत्काल आवश्यकता पर भी जोर दिया. उनका यह कहना कि 20 वीं सदी में बने संस्थान 21वीं सदी की चुनौतियों से निपटने में अक्षम हैं, बिल्कुल सटीक है. आज की दुनिया 1940 के दशक की दुनिया से बहुत अलग है, जब संयुक्त राष्ट्र और ब्रेटन वुड्स संस्थानों की स्थापना हुई थी. तब की शक्तियों और आज की उभरती शक्तियों के बीच संतुलन में भारी बदलाव आया है?.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद , विश्व व्यापार संगठन और बहुपक्षीय विकास बैंकों में सुधार की मांग लंबे समय से उठ रही है. ये संस्थान अब दुनिया की बदलती भू-राजनीतिक और आर्थिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करते . विकासशील देशों, विशेषकर ‘ग्लोबल साउथ’ को इन संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला है, जिसके कारण अक्सर उनके हितों की अनदेखी होती है. उदाहरण के लिए, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों की संख्या आज भी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की स्थिति को दर्शाती है, जबकि भारत और ब्राजील जैसे बड़े विकासशील देश इसमें स्थायी सीट के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
प्रधानमंत्री का यह स्पष्ट संदेश था कि दुनिया को एक नई, बहुध्रुवीय और समावेशी विश्व व्यवस्था की जरूरत है, जिसकी शुरुआत इन वैश्विक संस्थाओं में व्यापक सुधारों से होनी चाहिए. इन संस्थानों को अधिक लोकतांत्रिक, जवाबदेह और प्रतिनिधि बनाने से ही वे आज की जटिल वैश्विक समस्याओं, जैसे जलवायु परिवर्तन, महामारी और आर्थिक अस्थिरता का प्रभावी ढंग से समाधान कर पाएंगे.ब्रिक्स सम्मेलन ने एक बार फिर दिखाया है कि यह मंच केवल आर्थिक मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शांति, सुरक्षा और न्याय जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी अपनी आवाज उठा रहा है. आतंकवाद के खिलाफ ब्रिक्स देशों की एकजुटता और वैश्विक शासन में सुधार की उनकी सामूहिक मांग भविष्य में एक अधिक संतुलित और न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था की नींव रख सकती है. यह महत्वपूर्ण है कि ब्रिक्स सदस्य देश, जो दुनिया की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं, इन चुनौतियों पर एक समान दृष्टिकोण अपना रहे हैं.
