RSS ने की ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों की समीक्षा की मांग: आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर संविधान की प्रस्तावना में बदलाव पर बहस तेज

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आपातकाल के दौरान जोड़े गए शब्दों को हटाने का किया आह्वान; कहा – ये शब्द भारत की मूल भावना के विपरीत।

नई दिल्ली, 27 जून (नवभारत): राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 1976 में 42वें संशोधन द्वारा जोड़े गए शब्दों ‘धर्मनिरपेक्ष’ (Secular) और ‘समाजवादी’ (Socialist) की समीक्षा करने की मांग की है। संघ का तर्क है कि ये शब्द भारत की मूल भावना और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं और इन्हें संविधान में जोड़ने का निर्णय आपातकाल के दौरान लिया गया था, जब लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन हुआ था।

RSS के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि संघ लंबे समय से यह मानता रहा है कि भारत स्वाभाविक रूप से एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, और इसकी संस्कृति में सभी धर्मों के प्रति सम्मान समाहित है। ऐसे में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को अलग से जोड़ना अनावश्यक था। इसी तरह, ‘समाजवादी’ शब्द को लेकर भी संघ का मत है कि यह आर्थिक मॉडल के रूप में देश की विविध आर्थिक आवश्यकताओं को सीमित करता है, जबकि भारत की अर्थव्यवस्था में विभिन्न मॉडल सह-अस्तित्व में रहे हैं। संघ का मानना है कि इन शब्दों को हटाकर संविधान को उसके मूल स्वरूप में वापस लाया जाना चाहिए, जो राष्ट्र की वास्तविक पहचान को दर्शाता है। यह मांग ऐसे समय में आई है जब देश आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होने पर लोकतंत्र पर हुए हमलों को याद कर रहा है, और राजनीतिक गलियारों में इस पर नई बहस छिड़ने की संभावना है।

आपातकाल के दौरान 42वें संशोधन से जुड़े थे शब्द: क्या फिर होगा संविधान में बदलाव?

संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’, ‘समाजवादी’ और ‘अखंडता’ (Integrity) जैसे शब्द तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार ने 1976 में 42वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से जोड़े थे। यह संशोधन आपातकाल के दौर में किया गया था, जब कई मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया था और राजनीतिक विरोध को दबाया जा रहा था। आलोचकों का मानना है कि ये संशोधन बिना किसी व्यापक बहस या लोकतांत्रिक प्रक्रिया के किए गए थे।

RSS की यह मांग अब एक राष्ट्रीय बहस का विषय बन सकती है, जिसमें संविधान के मूल ढांचे, लोकतांत्रिक मूल्यों और देश की पहचान पर गंभीर चर्चा होगी। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और अन्य राजनीतिक दल इस मांग पर क्या रुख अपनाते हैं, और क्या भविष्य में संविधान की प्रस्तावना में किसी तरह के बदलाव की संभावना बनती है। इस बहस से देश की वैचारिक और राजनीतिक दिशा पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है।

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