
मंडला | नारायणगंज विकासखंड के ग्राम पोतला में इन दिनों सरकारी राशन का चावल विवाद का केंद्र बना हुआ है। यहां ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि उन्हें सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत “प्लास्टिक जैसा चावल” वितरित किया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि इस चावल को पकाने पर वह चिपकता है, पानी में तैरता है और जलाने पर प्लास्टिक की तरह पिघलता है। डर इतना गहरा है कि कई ग्रामीण इस चावल को जानवरों को खिला रहे हैं या सीधे फेंक दे रहे हैं।
हकीकत: प्लास्टिक नहीं, फोर्टीफाइड चावल
वास्तव में यह चावल “फोर्टीफाइड राइस” है,यानी ऐसा चावल जिसमें पोषण बढ़ाने के लिए आयरन, फॉलिक एसिड, विटामिन B-12 जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व मिलाए जाते हैं। इसका उद्देश्य कुपोषण की समस्या से जूझ रहे गरीब और ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को स्वास्थ्यवर्धक आहार उपलब्ध कराना है। लेकिन जागरूकता के अभाव में ग्रामीण इस चावल को कृत्रिम, हानिकारक और यहां तक कि “प्लास्टिक” मान बैठे हैं।
गांव में तीन माह बाद राशन का वितरण हुआ। जैसे ही ग्रामीणों ने चावल पकाया, उनके सामने उसकी बनावट, बनने की प्रक्रिया और स्वाद ने सवाल खड़े कर दिए। जानकारी के अभाव ने अफवाहों को जन्म दिया। ग्रामीण मुकेश कुमार मरकाम ने बताया, “हमें जो चावल मिला है, वह आग में प्लास्टिक जैसा जलता है। खाने से डर लगता है।” वहीं ओमप्रकाश मरावी कहते हैं, “इस चावल की कोई जानकारी नहीं दी गई, न राशन दुकान से, न पंचायत से ।
ग्रामीणों को न तो यह बताया गया कि यह पोषण युक्त चावल है, न ही यह समझाया गया कि इसकी बनावट सामान्य चावल से अलग हो सकती है। फोर्टीफाइड चावल के उपयोग, पहचान और महत्व को लेकर स्थानीय प्रशासन और खाद्य विभाग की तरफ से कोई प्रयास नहीं किए गए। नतीजा यह कि आदिवासी अंचल में अविश्वास और असंतोष पनप गया है नेता हमारे, पर समझाएगा कौन ? ग्राम पोतला की घटना सिर्फ एक तकनीकी गड़बड़ी नहीं है। यह संचार और प्रशासनिक विफलता का जीता-जागता उदाहरण है। सरकार की “पोषण अभियान” जैसी योजनाएं तभी सफल हो सकती हैं जब उनकी जानकारी लाभार्थियों तक पूरी ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ पहुँचे। पर यहां दुखद पहलू यह है कि जिन आदिवासियों ने अपने ही समाज के प्रतिनिधियों को चुना, उन्हीं की उपेक्षा अब उनके जीवन को प्रभावित कर रही है। एक तरफ अफसरों की खामोशी है, दूसरी तरफ नेताओं की गैरहाजिरी।
प्लास्टिक जैसा चावल नहीं, बल्कि प्रशासन और नेतृत्व की संवेदनशीलता ही पिघल रही है। सरकार और जिला प्रशासन को न सिर्फ सूचना का संचार बेहतर करना होगा, बल्कि उन संकल्पों को भी निभाना होगा जो हर चुनाव में आदिवासी हितों के नाम पर दोहराए जाते हैं।
