अमेरिका-चीन के बीच दुर्लभ मृदा धातुओं पर हुए समझौते से भारत का दबाव बढ़ा; ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे प्रमुख क्षेत्रों में कच्चे माल की कमी का खतरा, आत्मनिर्भरता की राह में बड़ी चुनौती।
नई दिल्ली, 13 जून (वार्ता): अमेरिका और चीन के बीच ‘रेयर अर्थ’ (दुर्लभ मृदा) धातुओं को लेकर हुए एक नए समझौते ने भारतीय उद्योग, विशेष रूप से ऑटोमोबाइल क्षेत्र के लिए एक नया संकट खड़ा कर दिया है। यह डील ऐसे समय में हुई है जब भारत अपनी विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ाने और महत्वपूर्ण खनिजों के लिए आयात पर निर्भरता कम करने का प्रयास कर रहा है। दुर्लभ मृदा धातुएं आधुनिक तकनीक, विशेष रूप से इलेक्ट्रिक वाहनों, इलेक्ट्रॉनिक्स और नवीकरणीय ऊर्जा के लिए अपरिहार्य हैं, और इन पर चीन का वैश्विक प्रभुत्व भारत के लिए चिंता का विषय रहा है।
अमेरिका-चीन के बीच हुए इस समझौते से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर चीन की पकड़ और मजबूत होने की आशंका है, जिससे भारत जैसे देशों के लिए इन महत्वपूर्ण खनिजों तक पहुंच और भी मुश्किल हो सकती है। भारतीय ऑटो इंडस्ट्री, जो तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ रही है, के लिए यह एक बड़ी चुनौती है क्योंकि दुर्लभ मृदा धातुएं इलेक्ट्रिक मोटर और बैटरी के प्रमुख घटक हैं। यदि इन खनिजों की आपूर्ति बाधित होती है या कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका सीधा असर भारत के इलेक्ट्रिक वाहन उत्पादन लक्ष्यों और उनकी लागत पर पड़ेगा, जिससे देश की आत्मनिर्भरता की राह में बड़ी बाधा आ सकती है। सरकार और उद्योग जगत को अब तेजी से घरेलू दुर्लभ मृदा खनन और प्रसंस्करण क्षमताओं को विकसित करने के साथ-साथ वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में इस तरह की भू-राजनीतिक डीलों के नकारात्मक प्रभावों से बचा जा सके।

