स्वप्न , शौर्य और स्वावलंबन

भारत की वायु सीमाओं में अब केवल परिंदे ही नहीं, उड़ेंगे,बल्कि आत्मनिर्भरता के पंखों से सुसज्जित वह राष्ट्रीय स्वप्न भी ऊंचाई पकड़ेगा, जिसे दशकों तक वैश्विक तकनीकी निर्भरता ने रोक रखा था. मंगलवार को जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने यह घोषणा की कि भारत अब पूरी तरह से स्वदेशी 5 वीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान विकसित करेगा, तब यह केवल एक रक्षा सौदे की सूचना नहीं थी. यह उस परिवर्तन की उद्घोषणा थी, जो भारत को रक्षा आयातक से रक्षा निर्माता और अब रक्षा निर्यातक राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की ओर अग्रसर है. दरअसल,यह निर्णय उस ‘राष्ट्र संकल्प’ का परिणाम है जो वर्षों से इस माटी की अंतर्ध्वनि में पल रहा था,कि भारत अपने रक्षण की शक्ति स्वयं रचेगा.कुछ वर्ष पहले तक रक्षा निर्यात भारत की कल्पना से भी परे की बात मानी जाती थी. किंतु आज हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि रक्षा निर्यात का आंकड़ा नए कीर्तिमान की ओर बढ़ रहा है. यह कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि उत्पादनशील राष्ट्र की परिपक्व योजना है,इसमें न केवल डीआरडीओ और एचएएल जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की महत्त्वपूर्ण संस्थाएं योगदान दे रही हैं, बल्कि हजारों एमएसएमई, स्टार्टअप्स और नवोन्मेषी युवाओं की सृजनशीलता भी भागीदार बन चुकी है.

इन सब प्रयासों का प्रत्यक्ष और तात्कालिक प्रमाण बना वह सैन्य अभियान, जिसने न केवल पड़ोसी को झकझोरा बल्कि पूरे विश्व को भारत की क्षमताओं पर पुनर्विचार करने पर विवश कर दिया. ‘ऑपरेशन सिंदूर’—जिसे अब आधुनिक सैन्य रणनीति का मील का पत्थर माना जा रहा है,ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत अब केवल सीमा पर सख़्त नहीं, बल्कि आसमान में भी निर्णायक है. जब केवल 22 मिनट के भीतर पाकिस्तान के बहावलपुर से लेकर कराची तक फैले 11 आतंकवादी अड्डों को भारतीय वायुसेना ने धूल चटा दी, तब विश्व ने देखा कि भारत अब तकनीक, संकल्प और साहस,तीनों में अग्रणी है.यह ऐतिहासिक सफलता कोई आकस्मिक घटना नहीं थी.भारत की सैन्य परंपरा और वीरता का एक गौरवशाली इतिहास है.बहरहाल, हम फिर आते हैं पांचवीं पीढ़ी के विमान पर. इस संदर्भ में भारत की तेजस परियोजना का उदाहरण पर्याप्त होगा. तेजस मार्क-2 की सफलता के साथ भारत अब न केवल मिड-क्लास फाइटर कैटेगरी में आत्मनिर्भर है, बल्कि अगली पीढ़ी के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है. यह विमान न केवल भारत की सीमाओं की रक्षा करेगा, बल्कि भारत के उस वैज्ञानिक आत्मविश्वास का परिचायक बनेगा जो अब रक्षा वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाओं में दमक रहा है.

यह भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि भारत की यह सामरिक उन्नति केवल सैन्य दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य से भी क्रांतिकारी सिद्ध हो रही है. भारत का यह 5वीं पीढ़ी का फाइटर जेट भी एक आक्रमण का औज़ार नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि, भारत शांति का उपासक है, किंतु असहाय नहीं. युद्ध उसका अंतिम विकल्प है, लेकिन आवश्यकता हुई तो वह विकल्प निर्णायक सिद्ध होगा.

फ्रांस के साथ यह सामरिक साझेदारी भी केवल तकनीकी आदान-प्रदान नहीं, एक परिपक्व कूटनीतिक संबंध का विस्तार है. राफेल के बाद यह अगला चरण भारत को ‘विकासशील ग्राहक’ से ‘विकसित साझेदार’ की भूमिका में प्रतिष्ठित करता है.यह विमान जब भारत की धरती पर बनेगा, तब वह न केवल भारत के आसमान को सुरक्षित करेगा, बल्कि भारत के वैश्विक स्थान को भी ऊंचा करेगा.इस संपूर्ण परिदृश्य में यदि कोई एक तत्व सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है, तो वह है भारत का बदलता हुआ मनोबल. यह अब कोई असहाय या द्वितीय पंक्ति का राष्ट्र नहीं रहा, जिसे तकनीक के लिए अनुदान और आयात की आवश्यकता पड़े .भारत अब निर्माता है, और जब कोई राष्ट्र अपने रक्षण का निर्माता बनता है, तब वह पराजित नहीं होता,चाहे रणभूमि हो या वैश्विक मंच !

 

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