नयी दिल्ली, 28 मई (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने असम में फर्जी पुलिस मुठभेड़ों के आरोपों की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच करने के लिए बुधवार को असम मानवाधिकार आयोग (एएचआरसी) को निर्देश दिया।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की अंशकालीन कार्य दिवस पीठ ने नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा में मानवाधिकार आयोगों के संवैधानिक महत्व को रेखांकित करते हुए एएचआरसी की निष्पक्ष रूप से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने की क्षमता पर पूरा विश्वास व्यक्त किया और उसे यह संवेदनशील जिम्मेदारी सौंपी।
पीठ ने यह निर्देश असम के एक अधिवक्ता आरिफ मोहम्मद यासीन जवादर की याचिका पर दिया, जिसमें राज्य में व्यापक रूप से न्यायेतर हत्याओं और पुलिस मुठभेड़ों की जांच के संबंध में ‘पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य’ के मामले में निर्धारित शीर्ष अदालत के दिशा-निर्देशों का पालन न करने का आरोप लगाया गया है।
पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा, “हम स्वतंत्र और शीघ्रता से आवश्यक जांच के लिए असम मानवाधिकार आयोग को जांच सौंपते हैं। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि पीड़ितों और परिवार के सदस्यों को उचित अवसर दिया जाए। राज्य आयोग उन सभी लोगों को आमंत्रित करते हुए एक सार्वजनिक नोटिस जारी करेगा जो पीड़ित होने का दावा करते हैं। इसमें गोपनीयता सुनिश्चित की जानी चाहिए।”
शीर्ष न्यायालय ने पीयूसीएल मामले के दिशा-निर्देशों की पुष्टि की, जिसके अनुसार मुकदमा दर्ज करना, मजिस्ट्रेट जांच करना और परिजनों को सूचित करना अनिवार्य है। न्यायालय ने कहा, “वे कानून के शासन की प्रधानता की पुष्टि करते हैं। कोई भी व्यक्ति या संस्था इससे ऊपर नहीं है।”
पीठ ने यह स्वीकार करते हुए कि कुछ मामलों की गहन जांच की आवश्यकता हो सकती है। उन्होंने कहा कि केवल मामलों के संकलन पर आधारित सामान्य निर्देश काफी नहीं है। हालांकि, अदालत ने आयोग को (जहां आवश्यक हो) आगे की जांच शुरू करने का अधिकार दिया और असम सरकार को जांच में पूर्ण सहयोग करने और किसी भी संस्थागत बाधा को दूर करने का भी निर्देश दिया।
न्यायालय ने जांच प्रक्रिया के दौरान गोपनीयता संरक्षण और संवेदनशीलता की आवश्यकता पर भी जोर दिया और असम राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वह प्रभावित व्यक्तियों को (जहां आवश्यक हो) मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करे।
असम सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिकाकर्ता द्वारा पीड़ितों को कानूनी सहायता की पेशकश करने पर चिंता जताई और तर्क दिया कि इससे ‘ब्लैकमेल’ जैसी रणनीति ‘सामान्य’ हो सकती है। पीठ की ओर से हालांकि न्यायमूर्ति कांत ने कहा कि पीड़ित चाहें तो याचिकाकर्ता से संपर्क कर सकते हैं, जिससे व्यवस्था में भरोसा बढ़ता है।
पीठ ने कहा, “हमें व्यवस्था पर भरोसा रखना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति चाहे तो वह उससे संपर्क कर सकता है।”
अदालत ने याचिकाकर्ता, पीयूसीएल के अधिकार क्षेत्र पर टिप्पणी की, “हम मामले को अदालत में लाने में याचिकाकर्ता की भूमिका को स्वीकार करना उचित समझते हैं।
राज्य सरकार की विभिन्न एजेंसियों द्वारा सत्ता के कथित दुरुपयोग के मामले अक्सर जनहित याचिकाओं के माध्यम से प्रकाश में आते हैं। हालांकि, मामलों का मात्र संकलन बिना गहन जांच के व्यापक दिशा-निर्देशों की गारंटी नहीं दे सकता।
पीठ ने कहा कि प्रथम दृष्टया (कुछ मामलों को छोड़कर) प्रक्रियागत उल्लंघनों का निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे। फिर भी, अदालत ने निष्पक्ष मूल्यांकन करने के लिए एक विश्वसनीय संस्थागत तंत्र की आवश्यकता पर बल दिया।
अधिवक्ता जवादर की इस याचिका में इसी तरह की एक जनहित याचिका को खारिज करने वाले गुवाहाटी उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी गई थी। उच्च न्यायालय ने माना था कि अलग से जांच करने की जरुरत नहीं थी, क्योंकि राज्य के अधिकारी पहले से ही मामलों की जांच कर रहे थे।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने आरोप लगाते हुए अदालत के समक्ष कहा कि मई 2021 में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के पदभार संभालने के बाद से 80 से अधिक फर्जी मुठभेड़ें हुई हैं। वहां पीयूसीएल के दिशा-निर्देशों का नियमित रूप से उल्लंघन किया गया है।
उन्होंने आरोप लगाया कि अक्सर पुलिस के बजाय पीड़ितों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किए जाते हैं। इन मामलों में कोई स्वतंत्र जांच नहीं हुई है। अधिवक्ता भूषण ने कथित पीड़ितों के हलफनामों का हवाला दिया और सुझाव दिया कि एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश स्वतंत्र जांच का नेतृत्व कर सकते हैं।
इस पर सॉलिसिटर जनरल मेहता ने तर्क दिया कि पीयूसीएल के दिशानिर्देशों का पूरी तरह से पालन किया जा रहा है और अगर आरोपों को बिना आलोचना के स्वीकार कर लिया जाता है, तो इससे लड़ने वाले पुलिस बलों का मनोबल गिर सकता है। राज्य में उग्रवाद की जांच की जानी चाहिए।
उन्होंने जोर देकर कहा कि घटना की जांच की जानी चाहिए, न कि अधिकारियों की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पीड़ितों के परिवारों को जांच के नतीजों को चुनौती देने का अधिकार है।
इसके बाद पीठ की ओर से न्यायमूर्ति कांत ने इस बात पर सहमति जताई कि पीयूसीएल के दिशा-निर्देश घटना-आधारित जांच पर केंद्रित हैं, न कि पुलिस अधिकारियों को निशाना बनाने की।
उन्होंने यह भी सवाल किया कि क्या किसी पीड़ित के परिवार ने मुठभेड़ से संबंधित आरोपपत्रों के निष्कर्षों को औपचारिक रूप से चुनौती दी है।
शीर्ष न्यायालय ने इस मामले में 25 फरवरी को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इसने पहले संभावित रूप से जांच का नेतृत्व करने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की सूची मांगी थी और मुठभेड़ मामलों में एएचआरसी की पिछली जांच के बारे में जानकारी मांगी थी।
नागरिक स्वतंत्रता को बनाए रखने में मानवाधिकार आयोगों की सक्रिय भूमिका की आवश्यकता पर बल दिया गया। याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत एक विशिष्ट उदाहरण, तिनसुकिया मुठभेड़ मामले में यह आरोप लगाया गया था कि पुलिस ने गुमशुदा व्यक्तियों की शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया जब तक कि पीड़ितों को प्रतिबंधित आतंकवादी समूह (उल्फा) में शामिल होने का इरादा नहीं बताया गया।
इसके बजाय पीड़ितों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया और स्थानीय पुलिस थाने के अधिकारी ने कथित तौर पर घटना में शामिल होने के बावजूद जांच अधिकारी के रूप में काम किया।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि वह जवाबदेही सुनिश्चित करना चाहता है। वह प्रक्रियागत अनुपालन तथा कथित न्यायेतर हत्याओं से निपटने में निष्पक्षता तथा राज्य सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संवैधानिक संतुलन बनाए रखना चाहता है।
