मुंबई, 24 अप्रैल (वार्ता) भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) में अप्रैल की बैठक की कार्यवाही के विवरण में सदस्यों के विचारों में उल्लेखनीय तालमेल दिखा।
उल्लेखनीय है कि सात से नौ अप्रैल को हुई इस बैठक में रिजर्व बैंक ने अपनी मुख्य ब्याज दर को 0.25 प्रतिशत घटा कर छह प्रतिशत पर ला दिया है और उसके बाद बैंकिंग क्षेत्र में ब्याज में नरमी दिखने लगी है।
रिजर्व बैंक द्वारा एमपीसी की इस बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के आयात- प्रशुल्क के फैसलों से संभावित नकारात्मक प्रभाव के जोखिमों के साथ ही भारत में मुद्रास्फीति में गिरावट को भी रेपो रेट-कटौती के निर्णय का आधार बताया गया।
बैठक में माना गया है कि वैश्विक अनिश्चितता को देखते हुए निकट अवधि के नीतिगत-मार्ग पर स्पष्टता लाने की आवश्यकता है।
गवर्नर संजय मल्होत्रा ने नीतिगत ब्याज दर में 0.25 प्रतिशत की कटौती के प्रस्ताव का पक्ष लेते हुए बैठक में कहा, “ऐसे समय जब खुदरा मुद्रास्फीति अच्छी तरह से 4.0 प्रतिशत के अपने लक्षित स्तर के आसपास है और आर्थिक वृद्धि दर अब भी मध्यम स्तर पर है और इसमें सुधार हो रहा है, तो ऐसी मौद्रिक नीति वृद्धि की गति को और बढ़ाने के लिए घरेलू मांग आवेगों को पोषित करने वाली होनी चाहिए। ”
उन्होंने यह भी कहा कि आगे भी, विकसित विकास-मुद्रास्फीति प्रक्षेपवक्र को देखते हुए, मौद्रिक नीति को समायोजन करने की आवश्यकता है।
वित्तीय सेवा कंपनी एमके ग्लोबल ने आरबीआई की बैठक के विवरण का विश्लेषण करते हुए कहा है कि एमपीसी की जून की अगली द्वैमासिक बैठक में भी ब्याज में 0.25 प्रतिशत की कमी तय है और उसके बाद आगे चल कर 0.25-0.50 प्रतिशत तक कटौती की जा सकती है।
एमके ग्लोबल ने कहा है कि इस बैठक में एमपीसी के सदस्य एक ही राग अलाप रहे हैं। सदस्यों के विचारों और दृष्टिकोण में उल्लेखनीय तालमेल दिखाई देता है जो कि रेपो दर में 0.25 प्रतिशत की कटौती करने के सर्वसम्मत निर्णय से स्पष्ट है। इस रुख को ‘तटस्थ’ से बदल कर उदार या ‘समायोज्य’ में बदल दिया गया है।
बैठक में सदस्य इस राय के सहमत थे कि मुद्रास्फीति के सौम्य स्थिति और आगे इसमें नरमी बने रहने के परिदृश्य के बीच आर्थिक वृद्धि का समर्थन करने की आवश्यकता है।
एमपीसी एकमत थी कि अमेरिका की शुल्क की घोषणाएं बनी रही तो वैश्विक आर्थिक वृद्धि को काफी क्षती पहुंचेगी और उसका भारत की निकट अवधि की आर्थिक वृद्धि की संभावनाओं को भी नुकसान पहुंचेगा। समिति के ज्यादातर सदस्यों ने कहा कि भारत की आर्थिक वृद्धि मुख्य रूप से घरेलू मांग से प्रेरित है जो महत्वपूर्ण वैश्विक झटकों के खिलाफ एक बफर की सुविधा उपलब्ध कराती है।
गवर्नर मल्होत्रा का मानना है कि मजबूत घरेलू मांग वैश्विक बाधाओं के खिलाफ एक सुरक्षा प्रदान करेगी।
डॉ. राजीव रंजन ने भारत की अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति की ओर इशारा किया क्योंकि यह मुख्य रूप से घरेलू संचालित है।
सदस्यों ने राय व्यक्त की कि बाहरी हालात से के संभावित प्रभाव से वृद्धि के लिए जोखिम बढ़ गए हैं। सौगत भट्टाचार्य अमेरिकी प्रशुल्क कार्रवाई के मद्देनजर ऐसे संभावित बाहरी प्रभावों के असर को लेकर थोड़ा अधिक चिंतित थे ।
डॉ. नागेश कुमार रेपो दर में बड़ी कटौती (0.50 प्रतिशत कटौती) के पक्ष में थे, पर साथ में उन्होंने वैश्विक अनिश्चितता के मद्देनजर सतर्क रहने और धीरे-धीरे ढील देने की आवश्यकता की आवश्यकता बताई।
सदस्य यह कहने में भी एकमत थे कि मुद्रास्फीति का दृष्टिकोण अब कुछ महीने पहले की तुलना में कहीं बेहतर है और अब एमपीसी को और वृद्धि की आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित करने का अधिक मौका मिला है। समिति ने सामान्य मानसून और अच्छी रबी फसल की उम्मीद, विनिर्मित उत्पादों की मुद्रास्फीति में स्थिता और वैश्विक कच्चे तेल और जिंसों की कीमतों में गिरावट को मुद्रास्फीति के परिदृश्य के बारे में अपने दृष्टिकोण का प्रमुख कारण बताया ।
श्री भट्टाचार्य ने कहा कि भारत में वस्तुओं की संभावित विदेशी ‘डंपिंग’ निश्चित रूप से घरेलू उत्पादन के लिए चिंता का विषय है, लेकिन यह कच्चेमाल और मध्यवर्ती वस्तुओं की लागत को कम करके मुद्रास्फीति के को नीचे लाने या नीचे बनाए रखने में सहायक होगी।
